Pongal: पोंगल पर नई फसल की पूजा क्यों जरूरी, इस त्योहार पर क्या-क्या खास करते हैं दक्षिण भारत के लोग?
पोंगल 2026 दक्षिण भारत का प्रमुख कृषि पर्व है. यह नई फसल, सूर्य और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का उत्सव है. इस चार दिवसीय पर्व में समृद्धि, संतुलन और सकारात्मक ऊर्जा के लिए पारंपरिक अनुष्ठान किए जाते हैं. पोंगल, नई शुरुआत और खुशहाली का प्रतीक एवं सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करता है. हैदराबाद से समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की यह खास रिपोर्ट:-
हैदराबाद, 14 जनवरी 2026. हर वर्ष जनवरी माह में मनाया जाने वाला "पोंगल पर्व " दक्षिण भारत की संस्कृति और कृषि परंपरा का प्रमुख उत्सव माना जाता है. वर्ष 2026 में पोंगल 14 जनवरी से 17 जनवरी तक मनाया जाएगा. यह पर्व केवल नई फसल के स्वागत तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति, सूर्य और धरती के प्रति आभार प्रकट करने का अवसर भी माना जाता है.
पोंगल के दौरान की जाने वाली पूजा, अनुष्ठान और पारंपरिक विधियां जीवन में समृद्धि, संतुलन और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक मानी जाती है. यही कारण है कि पोंगल को दक्षिण भारत का सबसे महत्वपूर्ण कृषि पर्व कहा जाता है. पोंगल पर्व का मुख्य उद्देश्य नई फसल के प्रति आभार व्यक्त करना है. इस दिन किसान अपनी पहली उपज को सूर्य देव और धरती माता को अर्पित करते हैं.
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, नई फसल की पूजा करने से अन्न की शुद्धता बनी रहती है और आने वाला वर्ष समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है. नई फसल की पूजा यह संदेश देती है कि मनुष्य और प्रकृति का संबंध संतुलन व सम्मान पर आधारित होना चाहिए.
सूरज उपासना और पोंगल का ज्योतिषीय पक्ष
पोंगल का पर्व सूर्यदेव से विशेष रूप से जुड़ा हुआ है. यह त्योहार सूर्य के उत्तरायण होने और मकर राशि में प्रवेश के समय मनाया जाता है. सूर्यदेव को अन्न, ऊर्जा और जीवन का आधार माना जाता है, इसलिए पोंगल पर सूर्य उपासना का विशेष महत्व है. इस दिन सूर्य को अर्घ्य देना, दीप जलाना और पोंगल यानी भोगी अर्पित करना शुभ माना जाता है, जिससे जीवन में स्पष्ट्ता और आत्मबल बढ़ाने के संकेत माने जाते हैं.
पोंगल पर दक्षिण भारत की विशेष परंपराएं
दक्षिण भारत में पोंगल चार दिनों तक अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है. पहले दिन भोगी पोंगल पर पुराने सामान का त्याग और नए जीवन की शुरुआत का संदेश दिया जाता है. दूसरे दिन थाई पोंगल पर नए चावल, दूध और गुड़ से पोंगल बनाकर सूर्य देव को अर्पित किया जाता है. तीसरे दिन मट्टू पोंगल पर पशुधन की पूजा की जाती है. क्योंकि कृषि जीवन में इसका विशेष योगदान माना जाता है. चौथे दिन कानूम पोंगल पर परिवार और सामाजिक मेल मिलाप को महत्व दिया जाता है.
खान - पान, रंगोली और सामूहिक उत्सव पोंगल पर्व पर खान - पान और सजावट का विशेष महत्व होता है. घरों के सामने रंगोली या कोलम बनाई जाती है, जो शुभता और सौभाग्य का प्रतीक मानी जाती है. पोंगल प्रसाद, गन्ना, नारियल और ताजे फल इस पर्व की पहचान है. लोग पारंपरिक वस्त्र पहनते हैं और सामूहिक रूप से उत्सव मनाते हैं. यह पर्व सामाजिक एकता, पारिवारिक संबंधों और सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करने का माध्यम भी होता है.