'बीवी है नौकरानी नहीं'; खाना न बनाने पर तलाक मांगने वाले पति को हाई कोर्ट की दो- टूक
तेलंगाना हाईकोर्ट ने पति- पत्नी के संबंधों को लेकर एक ऐतिहासिक और बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि अगर पत्नी कामकाजी है तो उसका खाना न बना पाना क्रूरता की श्रेणी में नहीं आता. हैदराबाद से समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की खास रिपोर्ट:-
हैदराबाद, 7 जनवरी 2026. वैवाहिक रिश्तों और बदलते सामाजिक परिवेश को लेकर तेलंगाना हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि अगर पत्नी कामकाजी है तो उसका खाना न बना पाना या सास की घरेलू कामों में मदद न कर पाना क्रूरता की श्रेणी में नहीं आता. कोर्ट ने इसे वैवाहिक जीवन की सामान्य खींचतान करार देते हुए पति की तलाक अर्जी को खारिज कर दिया है.
हैदराबाद निवासी पेशे से लॉ ग्रेजुएट व्यक्ति ने अपनी पत्नी के खिलाफ तलाक की याचिका दायर की थी. उसकी पत्नी एक आईटी प्रोफेशनल है. पति का आरोप था कि शादी के बाद से ही उसकी पत्नी उसके और उसके परिवार के साथ उचित व्यवहार नहीं कर रही थी. पति ने अदालत में दलील दी थी कि उसकी पत्नी न तो उसके लिए खाना बनाती थी और न ही घर के कामों में उसकी मां (सास) का हाथ बंटाती थी. इसके अलावा उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी अक्सर अपने मायके चली जाती थी और उसने अलग घर बसाने की मांग करके उसे पर मानसिक दबाव बनाया.
कोर्ट ने क्या कहा..
जस्टिस मौसमी भट्टाचार्य और जस्टिस नागेश भीमपाका की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए बदलते दौर की चुनौतियों और कामकाजी दंपतियों की जीवनशैली को गहराई से समझा. अदालत ने पाया कि दोनों ही पति-पत्नी निजी क्षेत्र में कार्यरत हैं और उनकी शिफ्ट का समय एक - दूसरे से बिल्कुल अलग है. रिकॉर्ड के मुताबिक, पति दोपहर 1 बजे ऑफिस जाता था और रात 11 बजे घर लौटता था. वहीं पत्नी सुबह 6 बजे उठकर घर के काम निपटाकर 9 बजे ऑफिस के लिए निकलती थी और शाम 6 बजे लौटती थी. जब दोनों के काम के घंटे इतने चुनौती पूर्ण हो तो केवल खाना न बना पाने को आधार बनाकर उसे क्रूरता कहना गलत है.
यह वैवाहिक जीवन की सामान्य टूट- फूट है, जिसे क्रूरता नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने कहा कि यदि सास को बहू से घर के कामकाज में मदद न मिलने की शिकायत है तो उसे कानूनी तौर पर 'मानसिक क्रूरता ' के दायरे में नहीं रखा जा सकता. अदालत में संवेदनशीलता दिखाते हुए नोट किया कि पत्नी का अपने मायके में रहना जायज था, क्योंकि वह गर्भपात के बाद शारीरिक और मानसिक रूप से उबर रही थी. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अलग रहने का सुझाव पत्नी के वकील की ओर से जिरह के दौरान आया था, न कि पत्नी ने खुद इसकी जिद की थी. अदालत ने साफ संदेश दिया है कि शादी जैसे पवित्र बंधन को छोटी - मोटी शिकायतों या घरेलू कामकाज के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब जीवनशैली तेजी से बदल रही हो.