• दिल्ली में बीजेपी सरकार का 1 वर्ष पूरा, "याद आ रहे केजरीवाल"

    वर्ष 2025 से पहले की सरकार में अरविंद केजरीवाल का नाम दिल्ली के हर घर में एक ऐसा लीडर के तौर पर लिया जाता था, जिसने राजनीति की भाषा बदली और " वोट " के एवज में "रोजगार" की बात की. समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की खास रिपोर्ट:-

    नई दिल्ली, 21 फरवरी 2026. दिल्ली की सियासत में 1 वर्ष के भीतर तस्वीर कितनी बदली है, यह अब सड़कों पर दिख रहा है. हाल ही में दिल्ली प्रदेश आप पार्टी के अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने एक पत्रकार वार्ता में  जो कुछ कहा, वह सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं था, बल्कि दिल्ली की जमीनी  हकीकत की ओर इशारा था कि अब दिल्ली को 1 वर्ष में ही केजरीवाल याद आने लगा है. सौरभ भारद्वाज ने तंज कसते हुए कहा कि 1 घंटे विलंब से आयोजित की गई पत्रकार वार्ता के लिए दिल्ली और केंद्र सरकार का " धन्यवाद" करना चाहिए, ऐसा इसलिए कि तीन दिनों से मध्य दिल्ली में ऐसा ट्रैफिक जाम कि टैक्सी चालक तक उसे इलाके में आने को राजी नहीं .

    यह वही दिल्ली है, जिसने साल 2025 से पहले आम आदमी पार्टी की सरकार के दौरान शिक्षा, स्वास्थ्य और बिजली-- पानी के मामले में बदलाव का मॉडल देखा. मोहल्ला क्लीनिक निर्धन और मध्यम वर्ग के लिए सहारा थे. शासकीय विद्यालयों के नतीजे और इन्फ्रास्ट्रक्चर की बात देश विदेश तक की जाती थी. बिजली के बिल कमाए कम आए, पानी की सप्लाई बेहतर हुई और आम पब्लिक को लगा कि  सरकार उसके दरवाजे तक आई है. लेकिन अब एक वर्ष होने को हुए, हालात उलट दिखाई दे रहे हैं. रेखा गुप्ता के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार के 1 वर्ष पूरे होने पर जब शहर में होर्डिंग - पोस्टर लगे, " 1 साल दिल्ली बेहाल, याद आ रहे केजरीवाल " तो उनमें किसी का तस्वीर नहीं था, न ही पीएम नरेंद्र मोदी का. केवल एक संदेश था, जो सीधे आम जनता की मन को छूता है. सवाल यह है कि यदि सब कुछ ठीक है तो नाम से डर कैसा?

    दरअसल, दिल्ली की जनता भावनाओं से अधिक अपने रोजमर्रा के अनुभव से निर्णय लेती है. सुबह घर में पानी नहीं आता, बच्चा शासकीय विद्यालय में पहले जैसा माहौल नहीं पता, क्लीनिक में डॉक्टर नहीं मिलता, सड़क पर घंटे जाम में फंसे रहना पड़ता, तो नाराजगी और आक्रोश लाजमी है. यही आक्रोश अब  होर्डिंग्स और चर्चाओं में भी झलक रही है. 1 वर्ष के शासन का मतलब सत्ता में बने रहना नहीं होता, बल्कि यह साबित करना होता है कि जनता का जीवन कितना बेहतर हुआ है.

    यदि हिंदुस्तान की राजधानी दिल्ली की तस्वीर में सुधार के बजाय अव्यवस्था दिखे, तो सवाल उठेंगे ही और जब सवाल उठाते हैं, तो तुलना भी होती है, उस दौर से, जब आम लोगों को लगता था कि सरकार उनके लिए काम कर रही है. दिल्ली आज उसी तुलना के दौर से गुजर रही है. जनता के मन में उठ रहा सवाल स्पष्ट है: क्या दिल्ली फिर से उस मॉडल की ओर लौटेगी, जिसे कभी " दिल्ली मॉडल" कहा गया था, या मौजूदा हालात ही उसकी नई पहचान बनेंगे.

    दिल्ली की गलियों में लोग पूछ रहे हैं

    मोहल्ला क्लीनिक क्यों सुस्त और बंद पड़े हैं? शासकीय अस्पतालों में लाईनें लंबी क्यों हो गई? विद्यालयों में  वही ऊर्जा और सुधार क्यों नहीं दिख रहा? कई इलाकों से पानी न आने और सफाई व्यवस्था ढीली होने की शिकातें क्यों आ रही है?