• जब UPSC क्रैक का जश्न जल्द मातम में बदला

    बुलंदशहर की शिखा ने सूची में अपना नाम देखकर 113वीं रैंक अपनी मान ली. परिवार में जश्न शुरू हो गया, बधाइयों का दौर भी चल पड़ा. लेकिन अब कहानी पलट गई. दरअसल 113वीं रैंक हरियाणा की दूसरी शिखा की थी. नाम एक जैसा होने की वजह से यह भ्रम हुआ और खुशी का माहौल अचानक हैरानी में बदल गया.

    बुलंदशहर, 12 मार्च 2026। 'मुझे लगा मेरा ही सेलेक्शन हुआ है, मैंने नाम देखा था रोल नंबर नहीं…' UPSC रिजल्ट की पीडीएफ में सिर्फ नाम देखकर बुलंदशहर की शिखा ने 113वीं रैंक अपनी मान ली. परिवार ने जश्न भी मना लिया, रिश्तेदारों और परिचितों को खुशखबरी दे दी गई. लेकिन कुछ ही समय बाद जब सच्चाई पता चला तो कहानी ही पलट गई. रोल नंबर और पूरी सूची दोबारा देखी गई तो सच्चाई सामने आई और पूरी कहानी ही बदल गई. दरअसल जिस 113वीं रैंक को शिखा अपना समझ रही थीं, वह किसी दूसरी शिखा हरियाणा की हैं.

    बुलंदशहर से दिल्ली तक फैली खबर

    देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक मानी जाने वाली सिविल सेवा परीक्षा का परिणाम जैसे ही जारी हुआ, बुलंदशहर के एक साधारण परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई. खबर मिली कि उनकी बेटी शिखा ने UPSC में 113वीं रैंक हासिल कर ली है. कुछ ही देर में यह खबर इलाके में फैल गई. पड़ोसी, रिश्तेदार और परिचित बधाइयां देने पहुंचने लगे. हर कोई यह मान रहा था कि एक साधारण परिवार की बेटी ने बड़ी सफलता हासिल कर ली है. लेकिन इस खुशी के बीच एक छोटी-सी चूक छिपी हुई थी, जो कुछ समय बाद सामने आ गई.

    नाम देखा, रोल नंबर नहीं

    बुलंदशहर की शिखा ने खुद इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अपनी गलती स्वीकार की है. उन्होंने बताया कि रिजल्ट आने के बाद उन्होंने UPSC की पीडीएफ सूची में अपना नाम देखा और खुशी से भावुक हो गईं. उस समय उन्होंने रोल नंबर की जांच नहीं की. शिखा के अनुसार, जिस उम्मीदवार का चयन हुआ है वह दूसरी शिखा हैं. हमारा नाम एक जैसा है. मैंने सिर्फ नाम देखा और रोल नंबर नहीं देखा. यही मेरी गलती थी.

    अस्पताल में थे पिता, बेटी की बात सुनकर भर आईं आंखें

    शिखा के पिता प्रेमचंद ने भी इस पूरे मामले को लेकर विस्तार से बताया. उन्होंने कहा कि जब शिखा ने अपना नाम देखा तो वह बेहद भावुक हो गईं और तुरंत घरवालों को यह खुशखबरी दे दी. उन्होंने बताया कि उस समय प्रेमचंद अस्पताल में थे. बेटी ने रोल नंबर नहीं देखा, सिर्फ नाम देखा. नाम देखते ही भावुक हो गई और हमें बता दिया. जैसे ही इसने बताया, हम भी भावुक हो गए. हमें लगा कि हमारी बिटिया का चयन हो गया है. कुछ समय तक परिवार के सभी लोग यही मानते रहे कि शिखा ने सिविल सेवा परीक्षा में शानदार सफलता हासिल कर ली है.

    इलाके में फैल गई थी सफलता की खबर

    जैसे ही यह खबर आसपास के लोगों तक पहुंची, बधाइयों का सिलसिला शुरू हो गया. सोशल मीडिया पर भी शिखा की सफलता की चर्चा होने लगी. लोगों को यह कहानी इसलिए भी प्रेरित कर रही थी क्योंकि शिखा का परिवार बेहद साधारण पृष्ठभूमि से आता है. बुलंदशहर के एक इंटर कॉलेज में शिखा के दादा चपरासी के पद पर काम करते हैं. सीमित आय के बावजूद उन्होंने हमेशा बेटी की पढ़ाई को प्राथमिकता दी. शुरुआत में जब यह खबर सामने आई कि शिखा ने UPSC में 113वीं रैंक हासिल की है, तो इसे संघर्ष और सफलता की कहानी के रूप में देखा जाने लगा. लोग कहने लगे कि एक चपरासी की पोती ने देश की सबसे कठिन परीक्षा पास कर यह साबित कर दिया कि मेहनत और लगन के सामने परिस्थितियां मायने नहीं रखतीं. हालांकि बाद में यह स्पष्ट हो गया कि परिणाम को लेकर भ्रम हुआ था, लेकिन इस कहानी ने कई लोगों को भावनात्मक रूप से छू लिया.