बिहार की होली (फगुआ) में बाबू वीर कुंवर सिंह का यह लोकगीत क्यों है खास? बंगला में उड़ेला अबीर..
बिहार की होली (फगुआ) सिर्फ रंगों और हुड़दंगों का खेल नहीं, बल्कि उन गीतों का गूंज भी है जो हर बिहारी के रगों में दौड़ता है. जब ढोलक की थाप पर 'बंगला में उड़ेला अबीर' के सुर निकलते हैं, तो आंखों के निकट 80 साल के उस वीर योद्धा बाबू वीर कुंवर सिंह की छवि जीवंत हो उठती है, जिन्होंने आरा शहर के पास जगदीशपुर की मिट्टी में गुलाल के साथ आजादी का संकल्प घोला था. समझते हैं बिहार की फगुआ का ये पहलू..
आरा, 4 मार्च 2026. बिहार की होली यानी फगुआ केवल रंगों का उत्सव नहीं है. बल्कि लोक धुनों, ऐतिहासिक वीरता और सामुदायिक एकता का एक अद्भुत समागम है. यहां होली को स्थानीय बोली में 'फगुआ ' के नाम से जाना जाता है. जब फगुनाई हवा चलती है, तो ढोलक की थाप और झाल की झंकार से पूरा बिहार सराबोर हो उठता है. हालांकि, यहां होली की शुरुआत बसंत पंचमी के दिन से ही हो जाता है. इस दिन से लोग अपने दरवाजों, सामुदायिक केंद्रों और मंदिरों में जुटान होकर पारंपरिक 'फगुआ ' गीतों का दौर शुरू कर देता है और जैसे-जैसे होली करीब आती है, पुरुष व महिलाओं में फाग गीतों की लय और तीव्रता बढ़ जाती है. जबकि गायक और वादक पूरे उत्साह के साथ अबीर - गुलाल उड़ाते हैं, जो सकारात्मक ऊर्जा और खुशियों का संचार करता है.
जब फाग गीतों में जिंदा होती है बाबू वीर कुंवर सिंह की 1857 की वीरता
बिहार की फगुआ यानी होली का एक अहम पहलू यहां का प्रसिद्ध भोजपुरी लोकगीत है, जो 1857 के महान स्वतंत्रता सेनानी बाबू वीर कुंवर सिंह की होली को समर्पित है. फागुन गीत की पंक्तियां कुछ इस प्रकार हैं:-"बंगला में उड़ेला अबीर, अरे लाल, बंगला में उड़ेला अबीर हो बाबू आहे, बाबू कुमार सिंह तेजवा बहादुर, बंगला में उड़ेला अबीर."
यह लोग फगुनाई गीत उस गुजरे वक्त की याद को ताजा कर देता है जब आरा शहर के दक्षिण पश्चिम में स्थित जगदीशपुर के अपने आवास पर बाबू वीर कुंवर सिंह बड़े हर्ष उल्लास के साथ होली यानी फगुआ खेलते थे. यह वहीं वीर योद्धा थे, जिन्होंने 80 वर्ष की आयु में भी अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे.