• समाजवाद के प्रखर प्रहरी बदरीविशाल पित्ती की 98 वीं जयंती यादगार  रहेगी

    डॉ. राममनोहर लोहिया, सोशलिस्ट पार्टी और  बदरी विशाल पित्ती - ये तीन नाम आपस में ऐसे गुंथे हुए हैं कि चाह कर भी इनको अलग नहीं किया जा सकता. पित्ती परिवार हैदराबाद के निजाम प्रशासन का भरोसेमंद साहूकार था. 'राजा बहादुर ' की पदवी से नवाजे गए पितामह दादा 'राय बहादुर', 'सर नाइटहुड' से अलंकृत किए गए दादा. हम सब पित्तीजी के कर्जदार हैं : राजकुमार जैन (समता मार्ग से साभार), समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की विशेष रिपोर्ट:-

    हैदराबाद, 27 मार्च 2026.' राजा ' के  ख़िताब से जाने गए एक पिता के घर में जन्म लेने वाले बदरीविशाल पित्ती सोशलिस्ट बनकर अनेक बार गरीबों, किसानों, मजलूमों, मजदूरों की खातिर और लोकतंत्र के सवाल पर सत्याग्रह करते हुए जेल गए. 1955 में बनी अखिल भारतीय सोशलिस्ट पार्टी का केंद्रीय कार्यालय सुदूर दक्षिण में हैदराबाद में ही डॉ. लोहिया ने क्यों बनाया क्योंकि वहां पर इस बड़ी जिम्मेदारी को संभालने वाले रावेल सोमैया, बदरीविशाल पित्ती जैसे नेता या कार्यकर्ता मौजूद थे. समाजवादी आंदोलन का विशेष कर  डॉ. लोहिया का विपुल साहित्य आज उपलब्ध है तो इसका श्रेय बदरीविशाल जी को ही जाता है.

    कभी-कभी तो इतना अभिभूत हो जाता है आदमी कि क्या कहें और क्या ना कहें?

    डॉ. लोहिया यायावर थे, उनका कोई एक ठिकाना नहीं था. उनके व्याख्यानों, भाषणों और लिखो का लेखों का संग्रह करने में बदरीविशाल पित्ती ने अपने आप को पूर्णकालिक रूप से खपा दिया था. डॉ. लोहिया का ज्यादातर साहित्य उनके भाषणों से संग्रहित किया गया है. उसे समय भाषणों के टेप होने, फिर लिपिबद्ध करने तथा उसको संपादित करने के श्रम साध्य कार्य के बाद, उसको छपवाने, और छोटी-छोटी पुस्तिकाएं बनवाकर वितरित करने का कार्य कोई मिशनरी ही कर सकता था. उस समय आज जैसी तकनीकी सुविधा नहीं थी.

    डॉ. लोहिया के निजी सचिव रह चुके प्रसिद्ध कवि कमलेश जी उस समय हैदराबाद से निकलने वाली पत्रिका 'कल्पना ' के संपादक मंडल में काम करते थे. उन्होंने लिखा है कि- डॉ. लोहिया की कोई सभा यदि हैदराबाद में होती तो अवश्य ही प्राय : अन्य शहरों में भी बदरीविशाल जी टेप रिकॉर्डर लेकर वहां उपस्थित रहते थे. उन दिनों अच्छी टेप मशीनें भारी और बड़े बक्से के आकार की होती थी. डॉक्टर साहब का बोला हुआ एक एक शब्द  रिकॉर्ड होता था. जब डॉ. लोहिया हैदराबाद से बाहर दौरे पर जाते, तब भी बदरीविशाल जी की कोशिश रहती थी कि वहां भी उनके भाषण रिकॉर्ड करने की व्यवस्था हो जाए.

    सोशलिस्ट पार्टी की बैठक हैदराबाद में होती या हैदराबाद से बाहर, पार्टी की सम्मेलन होते और उनमें डॉक्टर साहब का व्याख्यान होता तो  उसे भी बदरीविशाल जी स्वयं उपस्थित रहकर रिकॉर्ड करते." मई 1967 में दिल्ली पुलिस कर्मियों की हड़ताल हुई. पुलिस यूनियन के नेता ओमप्रकाश आर्य ने दिल्ली के सप्रू हाउस हॉल में डॉ. साहब पुलिसकर्मियों के  समर्थन में एक सभा करवाई. मैं भी उस सभा में मौजूद था. बदरीविशाल जी भी वहां आए हुए थे, उनके एक सहायक डॉ. लोहिया का  भाषण टेप कर रहे थे. बीच में दो बार बदरी जी उठकर टेप मशीन पर कार्य करने वाले कार्यकर्ता को समझाने गए.

    कमलेश जी ने  बदरीविशाल पित्ती के बारे में लिखा है कि "बदरीविशाल जी अपनी देखरेख में इन टेपों को कागज पर उतरवाते. मैंने तो अनेक बार उन्हें स्वयं नहीं यह कार्य करते देखा है. व्याख्यान के टाइप हो जाने के बाद बदरीविशाल जी स्वयं इसका संपादन करते. यह सब उनमें अद्भुत सावधानी, एकाग्रता, दत्तयितता, मनोयोग और कार्य के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव दिख पड़ता था. लोकसभा में लोहिया जी के भाषणों को बदरीविशाल जी ने संपादित किया. मुझे याद है कि हमारे छात्र जीवन में लोहिया साहित्य "नवहिंद " प्रकाशन, हैदराबाद से प्रकाशित होकर छोटी-छोटी पुस्तिकाओं  में चार-पांच रुपए में मिलता था.

    बदरीविशाल जी लोहिया के प्रति बेहद भावुक थे

    उन्होंने एक जगह लिखा है कि
    "जब डॉक्टर लोहिया की बात की जाए या उनके बारे में कुछ कहा जाए तो दिल में एक आंधी- सी आ जाती है, जो मन को बड़ा अस्त व्यस्त कर देती है, एक बार हैदराबाद में एक पत्रकार वार्ता में किसी पत्रकार ने डॉ. लोहिया से सवाल किया कि आप तो समाजवादी हैं, लेकिन हैदराबाद में आपके सबसे बड़े समर्थक बदरीविशाल पित्ती एक बड़े पूंजीपति हैं, क्या यह आपके समाजवाद का विरोधाभास नहीं है? इसके उत्तर में डॉ. लोहिया ने कहा कि मेरे पूंजीपति बदरीविशाल में तथा नेहरू के पूंजीपतियों में एक बड़ा अंतर है, बदरीविशाल मेरे साथ रहकर निरंतर धन खर्च कर रहा है, लेकिन नेहरू के साथ रहने वाले निरंतर पहले से और अधिक धनी होते जा रहे हैं. यह फर्क है, मेरे और नेहरू समर्थकों में. और इसलिए समाजवादी आंदोलन सदैव बदरीविशाल पित्ती जी का कर्जदार रहेगा. उनकी 98 वीं जयंती पर उन्हें शत-शत नमन.