• विद्यालय बनाने के लिए 800 वर्ष पुराने शिव मंदिर पर चला बुलडोजर, जमीन से निकले गणपति

    यह ऐतिहासिक शिव मंदिर "कोटा कट्टा " मड फ़ोर्ट क्षेत्र में स्थित था, जो प्राचीन तालाबों, दीवारों और प्राचीन काकतीय किलो के लिए मशहूर है. हेरिटेज एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस स्ट्रक्चर को नष्ट करने के बजाय संरक्षित किया जा सकता था अथवा सुरक्षित रूप से कहीं और भेजा जा सकता था. समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की  यह खास रिपोर्ट:-

    हैदराबाद, 12 मई 2026. तेलंगाना के वारंगल में एक शासकीय विद्यालय बनाने के लिए काकतीयकाल के 800 वर्ष प्राचीन शिव मंदिर को तोड़ दिया गया. जिसकी वजह से इलाके के लोगों में भारी आक्रोश है. कार्यकर्ताओं के साथ-साथ केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने भी मामले पर संज्ञान लिया है. मामला यहां के खानपुर मंडल के अशोकनगर का है. जिस शिव मंदिर को तोड़ा गया है उसे काकतीय राजा गणपति देव के शासनकाल के दौरान 13वीं शताब्दी में बनाया गया था. शासकीय स्कूल बनाने के लिए इस पर बुलडोजर चला दिया गया. इस दौरान जमीन से फरवरी 1231 ई. का एक दुर्लभ तेलुगू शिलालेख भी मिला है.

    मंदिर तोड़ने पर फूटा हेरिटेज एक्सपर्ट्स का गुस्सा

    इतिहासकारों का कहना है कि शिलालेख में  गणपति देव को "महाराजा " और " राजधिराजुलु के रूप में दिखाया गया है. इससे इसके ऐतिहासिक महत्व का पता चलता है. रिकॉर्ड्स के मुताबिक, शिलालेख को हेरिटेज विभाग द्वारा 1965 में ही प्रलेखित किया गया था. यह ऐतिहासिक शिव मंदिर "कोटा कट्टा " मड फ़ोर्ट क्षेत्र में स्थित था, जो प्राचीन तालाबों, दीवारों और पुराने काकतीय किलो के लिए मशहूर है. हेरिटेज विशेषज्ञों का कहना है कि इस स्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचाने के बजाय संरक्षित किया जा सकता था अथवा सुरक्षित रूप से कहीं और भेजा जा सकता था. उन्होंने सवाल उठाया कि तेलंगाना के मध्यकालीन इतिहास से जुड़े इस स्मारक को संरक्षित करने में अधिकारी कामयाब क्यों नहीं हो पाए.

    शिव मंदिर नष्ट करने को लेकर मामला दर्ज 

    तेलंगाना के मानवाधिकार अधिवक्ता रामाराव इम्माननी ने इसे लेकर पहले राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण में शिकायत दर्ज कराई, फिर केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय और पुरातत्व विभाग ने भी इसे नुकसान पहुंचाने को लेकर मामला दर्ज किया. शिकायत में तेलंगाना सरकार पर राज्य विरासत अधिनियम के तहत विरासत संरक्षण समिति का गठन न करने का भी आरोप लगाया है एवं मंदिर ध्वस्त करने की अनुमति देने वाले अधिकारियों के खिलाफ अधिनियम की धारा 30 के तहत कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है. मंदिर तोड़ने से पहले पुरातत्व एवं बंदोबस्ती विभागों से उचित अनुमति ली गई थी या नहीं, इस पर भी सवाल उठ रहे हैं.

    जल्दबाजी में मंदिर तोड़े जाने का आरोप 

    कार्यकर्ताओं का आरोप है कि मंदिर के ऐतिहासिक महत्व के बावजूद तोड़फोड़ का काम जल्दबाजी में किया गया. बता दें कि अब यह मुद्दा  राजनीतिक रंग ले चुका है और वारंगल कलेक्टर डॉ. सत्य शारदा एवं वरिष्ठ पुरातत्व अधिकारियों  सहित जिला प्रशासन की भूमिका की भी जांच की जानी चाहिए.

    इसे लेकर कई हेरिटेज ग्रुप्स ने जवाबदेही और क्षेत्र में अन्य काकतीयकाल के स्मारकों की सुरक्षा के लिए तत्काल कदम उठाने की मांग की है. दूसरी तरफ मंदिर को तोड़े जाने को लेकर इलाके में लोगों का गुस्सा फूट पड़ा है. लोग इस पर तीखी प्रतिक्रिया दे रहे हैं. लोग सवाल पूछ रहे हैं कि सदियों पुराने स्मारक को नुकसान पहुंचाए बिना विद्यालय क्यों नहीं बनाया जा सकता?