छोटा पैकेट, बड़ा धमाका
डी. आर. साहू
सुनो ओ हरजाई वफा ना रास आई
सत्ता पक्ष से जुड़ी एक नेत्री को आगे बढ़ाने के लिए एक भाई साहब ने सब कुछ दांव पर लगा दिया। यहां तक उन्होंने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की भी तिलांजलि दे दी। पच्चीस साल से वह कार्यकर्ता के कार्यकर्ता बने रह गए। लोगों को वह यह कहते थकते नहीं थे कि फलां सक्रिय राजनीति में स्थापित हो गई, मैंने तो गंगा नहा लिया। उधर बड़े भाई साहब का आशीर्वाद मिलते ही मोहतरमा को पद और प्रतिष्ठा सब कुछ मिलने लगा। शोहरत मिलते ही महोदया ने उस व्यक्ति को साफ-साफ कह दिया कि तुम बीच में दखल मत दिया करो, जैसा कि अक्सर होता है। तुम कभी मेरी मंजिल नहीं थे। इस गम में व्यक्ति ने पीना प्रारंभ कर दिया और अक्सर यह गाना गाते हैं- सुनो ओ हरजाई..।
हर नियम का तोड़ निकाल लेते हैं..
राज्य के प्रभारी डीजीपी को 15 महीने बाद अचानक एक दिन आदेश निकालकर कह दिया जाता है कि प्रभारी के रूप में बीते कार्यकाल को भी नियमित माना जाए, यानी उन्हें केवल अगले नौ महीने ही नियमित डीजीपी के रूप में मिलेंगे। बताते हैं सुप्रीम कोर्ट के दो साल के अनिवार्य कार्यकाल के एवज में भाई साहब ने शानदार तोड़ निकाला है। कहने को पूरे दो साल का कार्यकाल दे रहे हैं, लेकिन वास्तव में मिलेगा केवल नौ माह। बताते हैं कि भाई साहब ने मुखिया को कॉन्फिडेंस में लेकर अन्य राज्यों का अध्ययन करवाकर यह तोड़ निकाला है।
दुकान फीकी करने की कवायद
सूबे के दो दिग्गज माननीयों की दुकान फीकी करने के लिए तेजतर्रार आईएएस अधिकारियों को उनके विभागों में सचिव का प्रभार दिया गया है। एक भाई साहब के यहां पदस्थ दोनों सचिव जरा भी दाएं-बाएं होकर काम करना पसंद नहीं करती हैं। वहीं दूसरे भाईसाहब के यहां एक ओर मुख्यमंत्री सचिवालय की पकड़ रहेगी तो दूसरी ओर सोने की बिस्कुट वाली मैडम की पोस्टिंग की गई है। पता चला है कि दोनों भाई साहब बड़े ही मन मसोसकर रह रहे हैं। अपना दर्द आखिर किसे बताएं। यदि आपत्ति करते हैं तो उल्टे उनके काम लेने की क्षमता पर भी प्रश्नचिह्न लगेगा।
दिल परदेसी हो गया..
महानदी के एक साहब का मन इन दिनों काम में नहीं लगता है। उनके मातहत बताते हैं कि साहब खोए-खोए से रहते हैं। पता चला है कि साहब का दिल चुराकर एक दिलरुबा राज्य के अंतिम छोर पर स्थित जिले में चली गई हैं। भीषण गर्मी में 'ये मौसम और ये दूरी तुमसे मिलना है जरूरी' सोचकर साहब दुखी हो जाते हैं। खुद को दिलासा देने के लिए वह कभी-कभी मातहतों से कहते हैं कि मेरे और टीना के प्यार की बरसात जरूर होगी।
जितनी डफली, उतनी राग
राज्य में अरसे बाद हुए बड़े फेरबदल में केवल एक ही संशोधन हुआ। इस पर लोगों ने तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दी, किसी ने बताया कि बच्चों के एजुकेशन के कारण बदला गया है तो किसी ने बताया कि दूरी अधिक होने के आग्रह पर ऑर्डर में बदलाव हुआ है। जबकि असल कहानी कुछ और ही बयां करती है। बताते हैं कि वह इसलिए हुआ कि वादा के मुताबिक खोखे में पूजा- पाठ की सामग्री कम पाई गई।
अंगद के पांव
प्रदेश अभी गंभीर पेयजल की संकट से जूझ रहा है। बड़े फेरबदल में मंत्रालय के एक साहब को ढाई साल बाद भी बदले नहीं गए बल्कि उलटा मिशन डायरेक्टर अतिरिक्त प्रभार दे दिया गया। गंभीर पेयजल की समस्या के लिए लोग घर-घर पहुंचे पाइपलाइन को जिम्मेदार बताते हैं क्योंकि उसमें पानी नहीं आता। यद्यपि पाइपलाइन बिछाने का काम कागज में नहीं धरातल पर हुआ है। बस पानी सप्लाई का इंतजाम नहीं किया गया है। विभाग में साहब के पांव अंगद की तरह जमा होने के पीछे लोग अलग ही कहानी बता रहे हैं। खबर के मुताबिक आने वाले समय में वहां राज्यांश से करीब 2000 करोड़ का पेमेंट होना है। इससे जोड़ा जा रहा है।
'लूगरा चोरी': दंड और ईनाम
'लूगरा चोरी' पर हाल ही में एक मैडम पर गाज गिरी है। वहीं मंत्रालय में पदस्थ मोहतरमा को नए पद से नवाज दिया गया। बताते हैं कि उनके नाक के नीचे प्रदेश की 1 लाख महिलाओं को कम लंबाई की और घटिया किस्म की साड़ियां बांट दी गई। जो पहनते नहीं बनती। बताते हैं कि इससे पहले आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को डीबीटी के माध्यम से साड़ियों का पैसा दिया जाता था। इस बार 'लूगरा...' के नए कीर्तिमान स्थापित करने के उद्देश्य से 9 करोड़ की साड़ी खरीदी कर बांटी गई। जब वही विभाग 70 लाख महिलाओं को महतारी वंदन के पैसे हर माह डीबीटी के माध्यम से भेजता है तो क्या एक लाख आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को साड़ी के लिए पैसे नहीं दिए जा सकते थे?
पुछल्ला
एक माननीय विभाग को पूरा मथ डाल रहे हैं। इसके लिए उन्होंने आधा दर्जन से अधिक पीए रखे हुए हैं और सबको टारगेट दे रखे हैं। कोई भी स्रोत चूकना नहीं चाहिए। माननीय के इस उपाय से अमला हैरान और परेशान है। पूरा धार सूखने तक उनके लोग ही पी जा रहे हैं। अमले के लिए कुछ नहीं बच रहा है।
बूझो तो जानें..
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