• चितपावन ब्राह्मणों का इतिहास सती प्रथा का बंगाल से संबंध

    चितपावन ब्राह्मणों का इतिहास सती प्रथा का बंगाल (कोलकाता) से संबंध और इन संदर्भ में ऐतिहासिक- राजनीतिक चर्चा काफी जटिल और व्यापक रही हैं. क्या है इसके मायने  आईए जानते हैं. समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की यह विश्लेषणात्मक रिपोर्ट:-
    हैदराबाद, 28 फरवरी 2026. चितपावन ब्राह्मण जिन्हें कोंकणस्थ ब्राह्मण भी कहा जाता है. मुख्य रूप से महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र से हैं. ये अपनी विशिष्ट शारीरिक विशेषताओं (गोरा रंग अक्सर नीली और धूसर आंखें) के लिए जाने जाते हैं.

    मूल पहचान और ऐतिहासिक शक्ति

    18वीं सदी में पेशवाओं (बालाजी विश्वनाथ से बाजीराव द्वितीय तक) के शासनकाल में इस समुदाय ने  महाराष्ट्र में प्रशासनिक और राजनीतिक शक्ति के शिखर को प्राप्त किया था. पुणे और महाराष्ट्र की राजनीति में उनका प्रभाव रहा, जिसमें वीर सावरकर और नाथूराम गोडसे जैसे नाम भी शामिल हैं. हालांकि, सती प्रथा का मुख्य केंद्र  मध्यकालीन भारत में बंगाल (कोलकाता सहित) था. यह प्रथा 7 वीं से 11 वीं शताब्दी के बीच उत्तर भारत में अधिक प्रचलित हुई.

    कुटिल प्रथा और वजह

    बंगाल में सती प्रथा का कारण "दया भागा " कानून था जो  विधवा को संपत्ति का उत्तराधिकारी बनाता था. ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक, विधवाओं को संपत्ति से वंचित करने के लिए रिश्तेदारों द्वारा सती होने के लिए मजबूर किया जाता था या उन्हें नशीला पदार्थ देकर चिता पर बैठाया जाता था. लेकिन राजा राममोहन राय के प्रयासों से  1829 में लॉर्ड विलियम बैंटिक ने कानून बनाकर सती प्रथा को अवैध घोषित किया.

    चितपावन ब्राह्मणों और 'कुटिल शादी प्रथा' का संबंध

    ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय अध्ययनों में कुछ चितपावन समुदायों में कन्या मूल्य लेने की प्रथा का जिक्र मिलता है जो की कन्यादान के विपरीत है. वहीं चितपावन ब्राह्मणों के विवाह में 'गोंधल' और 'बोडण' (चार विवाहित महिलाओं द्वारा पूजा) जैसे अनोखे रीति - रिवाज होते हैं.

    ऐतिहासिक राजनीतिक विमर्श

    महात्मा गांधी की हत्या (जो गोडसे द्वारा की गई वो भी चितपावन ब्राह्मण थे) के बाद महाराष्ट्र में इन ब्राह्मणों के खिलाफ व्यापक हिंसा हुई थी जिसे अक्सर 'चितपावन नरसंहार' के तौर पर याद किया जाता है. इसे 1948 का 'नरसंहार' भी कहते हैं.

    राजनीतिक नैरेटिव

    आधुनिक समय में इस समुदाय की पहचान को राजनीतिक और ऐतिहासिक विमर्श में अक्सर दक्षिणपंथी राजनीति से जोड़कर देखा जाता है. क्योंकि वे वीर सावरकर और पुणे के पेशवाओं की विरासत का प्रतिनिधित्व करते हैं. दरअसल, चितपावन ब्राह्मणों का इतिहास उनके उत्कर्ष (पेशवा शासन) और 1948 के बाद संघर्षों के बीच झूलता रहा है. सती प्रथा मुख्य रूप से 18 वीं और 19वीं सदी के बंगाल की एक सामाजिक बुराई थी जिसे रोकने में कोलकाता के समाज सुधारकों ने अहम भूमिका निभाई. हालांकि, चितपावन ब्राह्मणों की प्रथाएं महाराष्ट्र के विशिष्ट कोंकणी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परिवेश से जुड़ी रही है.