जिंदा मछली निगलने के लिए पहुंचते हैं लाखों लोग, हैदराबाद की परंपरा फिर चर्चा में
हैदराबाद में हर साल एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जिसे लेकर आस्था और विज्ञान आमने-सामने नजर आते हैं. 'फिश प्रसादम ' नाम की इस परंपरा में लोगों को जिंदा मछली के साथ एक विशेष हर्बल मिश्रण दिया जाता है. आयोजकों का दावा है कि इससे दमा और सांस से संबंधित समस्याओं में राहत मिलती है, जबकि वैज्ञानिक समुदाय इसके पक्ष में कोई ठोस प्रमाण नहीं मानता.
हैदराबाद, 12 जून 2026. भारत में आस्था से जुड़ी कई ऐसी परंपराएं हैं, जो दशकों ही नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही है. इन्हीं में से एक है हैदराबाद का मशहूर 'बत्तिनी गौड परिवार' का ' फिश प्रसादम ' जिसे लेकर हर साल लाखों लोग तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद पहुंचते हैं. करीब 180 साल पुरानी इस परंपरा का आयोजन आमतौर पर मानसून की शुरुआत में किया जाता है. इस दौरान देश के अलग-अलग राज्यों से लोग हैदराबाद पहुंचते हैं और लंबी कतारों में खड़े होकर 'फिश प्रसादम ' प्राप्त करते हैं.
क्या है मछली प्रसादम?
इस परंपरा में एक छोटी जिंदा मछली के मुंह में एक विशेष हर्बल पेस्ट भरा जाता है. इसके बाद इसे दमा और अन्य स्वासन संबंधी समस्याओं से पीड़ित लोगों को निगलने के लिए दिया जाता है. इस परंपरा को आगे बढ़ने वाला बत्तिनी गौड़ परिवार से जुड़े कार्यक्रम में सम्मिलित होने वाले विशिष्ट समाजसेवी तथा सेवा निवृत्त न्यायाधीश टी. गोपाल सिंह कहते हैं कि यह हर्बल फार्मूला पीढियों से उनके पास है और इसे लेने से सांस संबंधी बीमारियों में राहत मिल सकती है.
लाखों लोग क्यों पहुंचते हैं?
'फिश प्रसादम' लेने वालों का मानना है कि इससे उन्हें दमा के लक्षणों में सुधार महसूस होता है. कई लोग अपने व्यक्तिगत अनुभव शेयर करते हुए कहते हैं कि इस उपचार के बाद उन्हें पहले की तुलना में बेहतर महसूस हुआ. इसी भरोसे के चलते हर साल लाखों लोग इस आयोजन में शामिल होते हैं. कई परिवार तो पीढ़ियों से इस परंपरा का हिस्सा बनते आ रहे हैं.
क्या कहते हैं डॉक्टर?
हालांकि, चिकित्सा विशेषज्ञों की राय इससे अलग है. डॉक्टर का कहना है कि अब तक ऐसा कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, जो यह साबित करें कि ' फिश प्रसादम ' दमा का इलाज कर सकता है. विशेषज्ञों के मुताबिक, दमा एक जटिल बीमारी है और इसका इलाज वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित दवाओं और उपचारों के जरिए ही किया जाना चाहिए. वे मरीजों हो सलाह देते हैं कि किसी भी वैकल्पिक उपाय को अपनाने से पहले चिकित्सकीय जरूर लें.
आस्था बनाम विज्ञान
'फिश प्रसादम ' को लेकर हर साल बहस छिड़ती है. एक तरफ इसे आस्था, परंपरा और व्यक्तिगत अनुभवों से जोड़कर देखा जाता है, तो दूसरी तरफ वैज्ञानिक समुदाय प्रमाण आधारित चिकित्सा पर जोर देता है. यही वजह है कि यह आयोजन केवल स्वास्थ्य से जुड़ा विषय नहीं रह जाता, बल्कि आस्था और विज्ञान के बीच चल रही बहस का भी हिस्सा बन जाता है.
क्यों चर्चा में रहती है यह परंपरा?
डिजिटल युग में भी 'फिश प्रसादम ' की लोकप्रियता कम नहीं हुई है. हर साल इसके वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होती है. जिंदा मछली के जरिए दमा से राहत मिलने का दावा लोगों की जिज्ञासा बढ़ाता है और यही कारण है कि यह परंपरा लगातार चर्चा में बनी रहती है. चाहे इसे आस्था का विषय माना जाए या विवादास्पद चिकित्सा पद्धति, एक बात तय है कि हैदराबाद का 'फिश प्रसादम ' आज भी लाखों लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है.
इसी क्रम में बदरी विशाल पन्नालाल पित्ती ट्रस्ट एवं अग्रवाल सेवा दल द्वारा 'मछली प्रसादम ' का वितरण कार्यक्रम यहां के प्रदर्शनी मैदान में आयोजित किया गया. जहां भारी संख्या में लोग मौजूद रहे. आपातकालीन चिकित्सा शिविर का लोकार्पण हरियाणा के पूर्व राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय ने किया. इस मौके पर पित्ती ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं अग्रवाल सेवा दल के परामर्शदाता शरद बी पित्ती, प्रचार संयोजक अजीत गुप्ता, विशिष्ट समाजसेवी टी. गोपाल सिंह, शंकर लाल यादव, मत्स्य विभाग के अध्यक्ष मेट्टू साई कुमार प्रमुख उपस्थित थे.