• रामचरितमानस हमारी सौहार्दपूर्ण संस्कृति का संविधान - अखिलेश यादव

    आलेख विशिष्ट समाजवादी चिंतक दीपक मिश्रा एवं समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की विशेष रिपोर्ट:-

    लखनऊ, 22 मई 2026. समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा दिए गए सार्वजनिक वक्तव्य का विशिष्ट समाजवादी चिंतक दीपक मिश्रा ने पुरजोर समर्थन किया है. उन्होंने श्री राम चरित मानस के पक्ष में अखिलेश यादव द्वारा दिए गए बयान को संविधान का लक्षणिक तात्पर्य  सम्यक विधान बताया है जिससे रामराज्य प्रतिबिंबित होता है. महाकवि तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस और महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण में वर्णित रामराज्य में सामाजिक सद्भाव, सामाजिक समरसता, सामाजिक न्याय और समाजवाद के स्पष्ट प्रबल, प्रामाणिक और प्रतिबद्ध पुट मिलते हैं.

    ● महर्षि वाल्मीकि के अनुसार-- रामो रामो राम इति 
     प्रजानामभवन् कथा :
     ● रामभूतं जगदभूद्रामे राज्यं 
    प्रशासति: रामराज्य में सभी राममय अथवा राम के समरूप थे. अर्थात् आपसी समरसता और सौहार्द की पराकाष्ठा थी. तुलसीदास ने इसी धारणा को कुछ यूं व्यक्त किया है -

    सिया राम मय सब जग जानी. करउँ प्रणाम जोरि जुग पाणी. तुलसी में बिना किसी विभेद और दुराग्रह सबमें सीता और राम की छवि देखा, तुलसी की चार पंक्तियां सेकुलरिज्म और समाजवाद की सशक्त संधारणा को प्रतिध्वनित करने के लिए पर्याप्त हैं -
    बयरु न कर काहू सन कोई 
    राम - प्रताप विषमता खोई 
    सब नर करहिं परस्पर प्रीति.
    चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति.
    दूसरे पंथ, धर्म, मत आदि के प्रति दुराग्रह और हिंसा भाव रखने वाले राम को मानने वाले नहीं हो सकते. तुलसी कहते हैं कि सभी लोगों में परस्पर प्रेम अथवा सौहार्द था  तो वाल्मीकि के अनुसार किसी के मन किसी के प्रति नफरत या हिंसा का दुषभाव नहीं था, नाभ्यहिंसन् परस्परम्.

    समाजवादी सच्चे रामराजी और रामाग्रही होते हैं. राम मनोहर लोहिया रामायण मेला के संकल्पक थे और राम, कृष्ण  व शिव की लौकिक व्याख्या की है, जिसे उनके समर्थकों ने इसी शीर्षक से पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया था. इसे अखिलेश यादव और रमाशंकर ने भी प्रकाशित करवाया है. इस आलेख के लेखक रामराज्य - राष्ट्रीयता और समाजवाद समाजवादी बौद्धिक सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष दीपक मिश्र हैं.