• बंगाल में कांग्रेस और कम्युनिस्टों का टूटा गठबंधन, सोले गेम या गुप्त समझौता?

    विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पश्चिम बंगाल और केरल में कांग्रेस ने कम्युनिस्ट दलों से अपना नाता तोड़ लिया है. इससे वहां की  राजनीति में नए समीकरण बनने के संकेत हैं. यह कठोर कदम कांग्रेस ने क्यों उठाया और इससे उसे क्या लाभ मिलेगा. साथ ही बंगाल में किसे फायदा मिलेगा एक रिपोर्ट..

    नई दिल्ली / कोलकाता/ हैदराबाद, 3 मार्च 2026. विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल में इस महीने की शुरुआत में कांग्रेस और वामपंथी दलों का रास्ता अलग हो गया. इससे बंगाल की राजनीति में नई सियासी समीकरण बन रहे हैं. फिलहाल पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली  तृणमूल कांग्रेस और  बीजेपी के बीच मुख्य मुकाबला माना जा रहा है. लेकिन इन सब के बीच सबसे अहम सवाल यह है कि कांग्रेस को अकेले चुनाव लड़ने के लिए किसने प्रेरित किया और इस विभाजन का पार्टी और उसके पूर्व सहयोगी दोनों के लिए क्या मायने हैं?

    एकला चलो कांग्रेस का दांव 

    बंगाल कांग्रेस के एक सीनियर लीडर ने बताया, केंद्रीय नेतृत्व का मानना है कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के पास फिलहाल खोने के लिए कुछ भी नहीं है, इसलिए अकेले चुनाव मैदान में उतरना कांग्रेस के लिए बेहतर रणनीति है. गठबंधन टूटने के बाद  कांग्रेस अब अपनी  वोट बैंक मजबूत करने पर लगी हुई है, ना की सीट बंटवारे की गणित पर. साथ ही कांग्रेस ने यह भी स्वीकार किया कि अब चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी का दबदबा बना रहेगा. कांग्रेस नेता ने कहा, वाम दलों के साथ कांग्रेस का गठबंधन टूटने से बंगाल की राजनीति में त्रिकोणीय समीकरण की कोई गुंजाइश नहीं रह जाएगी.

    पार्टी के पास खोने के लिए कुछ बचा नहीं, यह लड़ाई कांग्रेस को खुद ही लड़नी चाहिए 

    यह बात बंगाल कांग्रेस के एक  वरिष्ठ नेता ने कही. दूसरी तरफ राजनीतिक जानकार पार्टी के मौजूदा प्रदेश नेतृत्व और उसके पूर्व नेतृत्व के बीच अंतर की ओर भी इशारा करते हैं. उनका कहना है कि मौजूदा पार्टी राज्य प्रमुख शुभंकर सरकार के अपेक्षाकृत रवैए ने केंद्रीय नेतृत्व के लिए  वाम दल गठबंधन समाप्त करना आसान बना दिया. जबकि  पूर्व प्रदेश अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद अधीर रंजन चौधरी, ममता बनर्जी के जाने-माने आलोचक रहे हैं और उन्होंने एक साझा प्रतिद्वंदी को सत्ता से हटाने के प्रयास में  वामपंथियों से मतभेदों को दरकिनार कर दिया था.

    प्रतिक्रिया लेफ्ट की और उसका विकल्प 

    गठबंधन टूटने के  कुछ दिनों तक चुप्पी साधने के बाद, वामपंथी पार्टियों ने सीपीआई (एम) के महासचिव एमए बेबी के जरिए  कांग्रेस को जवाब दिया गया है. सीपीएम महासचिव बेबी ने कांग्रेस पर  'सांप्रदायिक ताकतों ' के खिलाफ एकता से दूर जाने का आरोप लगाया. वाम दलों का कहना है कि वे समान विचारधारा वाली दलों के साथ सहयोग के पक्षधर हैं, लेकिन कांग्रेस का मौजूदा रूख अलगाववादी है. उन्होंने कहा कि सांप्रदायिकता ताकतों, विशेषकर बीजेपी के विरुद्ध संघर्ष में, वामपंथी दल जहां भी संभव हो, कांग्रेस सहित समान विचारधारा वाले दलों से गठबंधन का पक्षधर है.

    केरल फैक्टर  है अहम 

    दिलचस्प बात है कि, केरल में कांग्रेस और  वाम दल सीधे प्रतिद्वंदी है और वहां भी चुनाव नजदीक है. ऐसे में बंगाल में अलग चुनाव लड़ना  दोनों दलों को केरल में असहज सवालों से बचा सकता है. गठबंधन टूटने में केरल फैक्टर इसलिए भी अहम  है, क्योंकि 2021 में वाम दलों ने केरल में लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल की, जिससे हर 5 साल में वामपंथी और कांग्रेस के बीच सत्ता के बारी-बारी से परिवर्तित होने का सिलसिला टूट गया था.