हसदेव मे 7 लाख पेड़ों की कटाई का खतरा, सरकार ने की भिलाई विधायक की मांग अनसुनी
छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र में प्रस्तावित केंटे एक्सटेंशन कोल ब्लॉक को लेकर भिलाई के विधायक देवेंद्र यादव ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की सलाहकार समिति को पत्र लिखकर 1742.60 हैकटेयर वन भूमि के डायवर्सन प्रस्ताव को खारिज करने की मांग की थी लेकिन सरकार ने इस प्रस्ताव पर 8 मई को दिल्ली में हुई चर्चा के दौरान खारिज कर दिया.
रायपुर/भिलाई, 29 मई 2026. विधायक देवेंद्र यादव ने अपने पत्र में लिखा था कि हसदेव अरण्य सिर्फ कोयले का क्षेत्र नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक परियोजना के कारण करीब 7 लाख पेड़ों की कटाई का खतरा है. इतना ही नहीं, उन्होंने लिखा था कि इससे पूरे इलाके का पर्यावरण संतुलन बिगड़ सकता है. इसलिए हसदेव को बचाने के लिए राजनीति से ऊपर उठकर फैसला लेने की जरूरत है.
98% हिस्सा घना वन क्षेत्र
विधायक देवेंद्र यादव ने बताया कि कोल ब्लॉक का करीब 98% हिस्सा घने वन क्षेत्र में आता है एवं यह इलाका जैव विविधता के लिहाज से काफी संवेदनशील माना जाता है. यहां हाथी, तेंदुआ और बाघ जैसे वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास है. इसके अलावा 400 से अधिक वनस्पति और जीव प्रजातियां एवं 100 से अधिक पक्षियों की प्रजातियां इस इलाके में पाई जाती है. विधायक ने अपने पत्र में यह भी लिखा था कि चरनोई नदी, हसदेव नदी और बांगो बांध के जल ग्रहण क्षेत्र पर भी इस परियोजना का असर पड़ सकता है. वहीं, इससे आसपास के गांवों पानी और खेती से जुड़ी दिक्कतें बढ़ सकती है.
आदिवासी समाज की आजीविका पर पड़ेगा असर
विधायक ने छत्तीसगढ़ विधानसभा में 26 जुलाई 2022 को परित उसे सर्वसम्मत प्रस्ताव का भी जिक्र किया, जिसमें हसदेव अरण्य क्षेत्र में आगे खनन नहीं किए जाने की बात कही गई थी. उन्होंने कहा कि राज्य की जनता और जनप्रतिनिधियों की भावना का सम्मान को सरकार ने अनदेखी की है. देवेंद्र यादव ने यह भी कहा कि, इस परियोजना से स्थानीय आदिवासी समुदायों की आजीविका पर सीधा असर पड़ रहा है.
'उच्च संरक्षण क्षेत्र ' वाले हसदेव अरण्य क्षेत्र में नई कोयला खदान को मंजूरी
छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य इलाके में गाने और मध्यम जंगलों के 1742, 6 हेक्टर क्षेत्र में लगभग 4.48 लाख पेड़ों की कटाई की अनुमति दिए जाने से और सरकार द्वारा अपने 'डिसीजन सपोर्ट सिस्टम ' टूल में इस क्षेत्र को 'हाई कंजर्वेशन जोन ' में रखने और हसदेव के जंगलों में यह तीसरी बड़ी कोयला खदान को मंजूरी मिलने से समग्र छत्तीसगढ़ में राजनीतिक सरगरमी तेज हो गई है. वहीं, आदिवासी समुदाय के लोग आक्रोशित हैं.