परिसीमन संवेदनशील मुद्दा, दक्षिण भारत की प्रदेशों की आशंका भी दूर करना जरूरी
तमिलनाडु में इस मामले पर व्यापक असंतोष उभर रहा है. तेलंगाना, कर्नाटक और केरल आदि प्रदेशों में भी परिसीमन में आबादी के आधार पर लोकसभा की सीटों में बढ़ोतरी होने पर तीखे सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या दक्षिण भारतीय प्रदेशों में परिवार नियोजन को लेकर बेहतर प्रदर्शन का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है.. समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की यह खास रिपोर्ट:-
नई दिल्ली/ चेन्नई, 19 अप्रैल 2026. इसमें कोई दो राय नहीं कि संसद में सीटों की संख्या में बढ़ोतरी समय की जरूरत हो सकती है और निर्धारित प्रक्रिया के तहत इसमें बदलाव हो सकते हैं. मगर किसी साल परिसीमन की कवायद को लेकर कई सवाल उभर के दिख रहे हैं. खास तौर पर दक्षिण भारत के प्रदेशों की ओर से यह आशंका जताई जा रही है कि परिसीमन के ताजा प्रस्ताव के तहत जो प्रारूप सामने आया है, अगर वह अमल में आया तो यह व्यापक स्तर पर भेदभाव का कारण बनेगा.
हालांकि, इस तरह के कदम उठाने से पहले देशभर में सर्वसम्मति कायम करने की अपेक्षा की जाती है, ताकि प्रदेशों के बीच मतभेद न उपजे, लेकिन परिसीमन को लेकर केंद्र सरकार की पहल के बाद तमिलनाडु में जिस तरह का विरोध उभर रहा है, उससे कई सवाल उठे हैं. गौरतलब है कि तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन ने गुरुवार को केंद्र के प्रस्तावित परिसीमन की कवायद के खिलाफ विरोध को तेज करते हुए इससे संबंधित विधेयक की प्रति जलाकर और काला झंडा दिखाकर पूरे प्रदेश में आंदोलन की शुरुआत कर दी है. इससे पहले स्टालिन ने यहां तक कहा था कि तमिलनाडु की चिंता को दूर किए बिना अगर परिसीमन को आगे बढ़ाया गया, तो प्रदेश में एक समय चल हिंदी विरोधी आंदोलनों जैसी हालत बन सकती है.
निश्चित रूप से एक संवेदनशील मुद्दे पर देश के अलग-अलग प्रदेशों में इस स्तर के मतभेद पैदा नहीं होने चाहिए थे और इससे जुड़ी चिंताओं का समाधान वक्त की जरूरत है. मगर हैरानी की बात यह है कि क्या केंद्र सरकार को इसका आभास नहीं था कि लोकसभा में सीटों की संख्या में बढ़ोतरी के क्रम में उत्तर और दक्षिण भारत के प्रदेशों के बीच जिस तरह का असंतुलन पैदा होने वाला है, उससे कई स्तर पर असंतोष उभर सकता है! दरअसल, सरकार परिसीमन को महिला आरक्षण के साथ जोड़कर पेश करने का प्रयास किया, ताकि इसे लेकर उठने वाली आपत्तियों को कमजोर किया जा सके.
मगर विपक्षी दलों की तरफ से ऐसे सवाल उठाए जा रहे हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग प्रदेशों में लोकसभा की सीटों में बढ़ोतरी संसद के समीकरण में वैसे प्रदेशों को मजबूत स्थिति में खड़ा करेगा, जहां बीजेपी ताकतवर है. इसके अलावा, सीटों के फिर से बंटवारे के क्रम में जो नया समीकरण बनेगा, उसमें दक्षिण भारत के प्रदेशों के प्रतिनिधित्व और अधिकारों में काफी कमी आने की आशंका जताई जा रही है.
दूसरी तरफ, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे कई प्रदेशों की नुमाइंदगी में काफी बढ़ोतरी हो जाएगी. शायद यही वजह है कि तमिलनाडु में इस मसले पर व्यापक असंतोष उभर रहा है. जबकि तेलंगाना, कर्नाटक और केरल आदि प्रदेशों में भी परिसीमन में आबादी के आधार पर लोकसभा की सीटों में बढ़ोतरी होने पर तीखे सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या दक्षिण भारतीय प्रदेशों को परिवार नियोजन को लेकर बेहतर प्रदर्शन का खामियाजा उठाना पड़ रहा है. अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि स्टालिन ने परिसीमन संशोधन को दक्षिणी प्रदेशों के खिलाफ और देश की प्रगति में योगदान देने की सजा तक कह दिया.
सवाल है कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर केंद्र सरकार को सभी प्रदेशों को विश्वास में लेने की जरूर क्यों महसूस नहीं हुई. एक पक्ष यह है कि परिसीमन का मुख्य आधार चूंकि जनगणना होता है, तो नई स्थितियों में इससे संबंधित किसी कवायद पर उठने वाले सवालों का हल क्यों नहीं निकाला गया? कोशिश इस बात की होनी चाहिए कि अगर परिसीमन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो इस मसले पर उभरने वाली आपत्तियों पर गौर किया जाए और सभी प्रदेशों के बीच सहमति कायम की जाए.