• चले गए शब्दों को जादुई बनाने वाले प्रसिद्ध शायर बशीर बद्र... 'जिंदगी तूने मुझे कब्र से कम दी है जमीन...

    91 वर्ष की उम्र में मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र का गुरुवार को भोपाल में इंतकाल हो गया. वह लंबे समय से बीमार थे. याददाश्त भी  साथ छोड़ चुकी थी. कभी वह मेरठ की महफिलों की शान होते हुए देश के सबसे प्यारे शायर बन गए. हालांकि, मेरठ ने उन्हें दिल में भी रखा और जख्म भी दिया. समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की यह विशेष रिपोर्ट---

    भोपाल, 28 मई 2026. प्रसिद्ध उर्दू शायर और आधुनिक गजल के उस्ताद पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र का भोपाल में लंबी बीमारी के बाद गुरुवार को 91 साल की आयु में निधन हो गया. मेरठ में एक जमाने में वह साहित्यिक आयोजन की शान हुआ करते थे. बाद में जब थोड़ी दूर पर स्थित उनके मकान के सामने से गुजरता था, तो उसकी दीवारों पर कुछ जले जैसे निशान नजर आते थे. मेरठ के 1987 के भीषण दंगों के बाद उन्होंने अपने इस शहर को हमेशा के लिए ही छोड़ दिया. लेकिन उनसे मुलाकातें, मुस्कुराहट और हर मौकों मौजूँ शायरियां अब तक याद तो है ही.

    मेरठ ऐसा शहर रहा है, जिसने देश को कई बड़े शायर दिए. कुछ लोग इस शहर को अब शुष्क शहर बता देते हैं लेकिन इस शहर की फिजाओं  में गीत, गजलों और शायरियों की फिजां तैरा करती थी. कुछ बात तो वहां की मिट्टी में है ही. बशीर बद्र 80 के दशक में देश के बड़े शायरों में शुमार हो चुके थे. मेरठ कॉलेज के उर्दू विभाग में प्रोफेसर थे. छात्रों के बीच लोकप्रिय. देश विदेश में मुशायरों में जाकर वाहवाही लूटने वाले.

    मेरठ में उनका घर और दंगे
    उनका घर मेरठ के शास्त्री नगर कॉलोनी के डी ब्लॉक के करीब एमआईजी मकान. जहां उनका होना एक शहर की शान और पहचान दोनों थी. 80 के दंगों में जब दंगाइयों ने  उनके मकान को भी नहीं छोड़ा तो हमेशा के लिए शहर छोड़ दिया. भोपाल चले गए और आखिरी सांस तक  वहीं मन लगाने की कोशिश करते रहे. हालांकि, मेरठ शहर हमेशा दिल में रहा. क्योंकि ये शहर उनकी पहचान के साथ जो चस्पां हो चुका था.

    बदलते मेरठ पर उनका वो शेर 

    बेशक उर्दू शायरी ने अपनी सबसे प्यारी आवाजों में एक को खो दिया. उनकी शायरी ने  मोहब्बत, तन्हाई, इंतजार और  जिंदगी के गहरे जख्मों को शब्द दिए. खूबसूरत शब्दों में पिरोई उनकी भावनाएं हमेशा पीढियों के दिलों में जिंदा रहेगी. अपने शहर मेरठ से रुखसत होते हुए या उससे कुछ पहले उन्होंने इस शहर के बदलते मिजाज पर कुछ पंक्तियां लिखी, जो बहुत अधिक चर्चित हुआ.
    ● कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से.
    ये नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो.
    ये मेरठ के दंगों को लेकर ही लिखा गया था. डॉ. बशीर बद्र 15 फरवरी 1936 को फैजाबाद में पैदा हुए थे. 91 वर्ष की उम्र में उनका लंबी बीमारी के बाद  भोपाल में 28 मई 2026 को इंतकाल हो गया. वह बेहतरीन शख्स थे. मुलायमित से व्यवहार करने वाले मृदुभाषी... इंसानियत और भाईचारे में यकीन रखने वाले.

    उनके कुछ चुनिंदे शायरी
    ● उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए.

    ● जिंदगी तूने मुझे कब्र से कम दी है जमीं, पाँव फैलाउँ तो दीवार में सर लगता है.

    ● कुछ तो मजबूरियां रही होगी, यूं कोई बेवफा नहीं होता.

    ● न जी भर के देखा न कुछ बात की, बड़ी आरजू थी  मुलाकात की.

    ● "लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में. "

    ● "दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
    जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों"
    आप बहुत याद आएंगे बशीर बद्र साहब. आपका वो शाइस्तगी से मुस्कुराता चेहरा और चश्मे के पीछे से चमकती हुई आंखें... खनकती और शब्दों के साथ थिरकती आवाज. अलविदा.