यूजीसी रेगुलेशन: सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई टली, पटना में दिखा दलित - बहुजनों का जोर
बिहार के इतिहास में यह पहला मौका था जब प्रदर्शनकारियों ने अपने हाथों में ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, रामास्वामी पेरियार, डॉ. अंबेडकर, जगदीश मास्टर, जगदेव प्रसाद और रामनरेश राम सहित अनेक दलित - बहुजन नायकों की तस्वीर ले रखी थी. समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की खास रिपोर्ट :-
पटना, 23 मार्च 2026. यूजीसी रेगुलेशंस - 2026 को लेकर सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई टाल दी गई. बताया जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट में कुछ मामलों में हुई लंबी सुनवाई के कारण ऐसा किया गया. उम्मीद है कि अब अगली सुनवाई अप्रैल माह में होगी. बता दें कि 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना ) विनियम, 2026 पर रोक लगा दी. खंडपीठ के 13 जनवरी की अधिसूचित इन विनियमों को लेकर विवाद खड़ा हो गया था क्योंकि इन्हें सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ कथित तौर पर 'अन्यायपूर्ण ' बताया गया था.
दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट के द्वारा रोक लगाए जाने के बाद देश के अनेक हिस्सों में दलित-- बहुजनों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की और सड़कों पर उतर आए .चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई की तारीख 19 मार्च निर्धारित किया था, इसलिए बीते 18 मार्च को यूपी और बिहार के कई शहरों में दलित - बहुजन सड़कों पर उतरे. इस मार्च में बिहार के विभिन्न जिलों, पटना, बक्सर, छपरा, सिवान, भोजपुर, अरवल, भागलपुर, जहानाबाद, बेगूसराय, रोहतास, समस्तीपुर, मधुबनी, गया, मुजफ्फरपुर, सहरसा, पूर्णिया, मधेपुरा, सुपौल और दरभंगा सहित अन्य इलाकों से हजारों की संख्या में लोग शामिल हुए.
गौरतलब है कि 18 मार्च, 1974 को संपूर्ण क्रांति का आंदोलन प्रारंभ हुआ था. इसकी वर्षगांठ के मौके पर बिहार की राजधानी पटना में यूजीसी रेगुलेशंस 2026 के समर्थन और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजातियों, अति पिछड़ा वर्गों के लिए 65% आरक्षण लागू करने, संसद से रोहित एक्ट का निर्माण करने इत्यादि मांगों को लेकर ऑल इंडिया फोरम फॉर इक्विटी के बैनर तले पटना गांधी मैदान से राजभवन मार्च आयोजित किया गया, जिसमें हजारों की संख्या में छात्र-- नौजवान, सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ता एवं विभिन्न जिलों से आए लोगों ने भाग लिया.
यह मार्च पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान से शुरू होकर जेपी गोलंबर को पार कर डाक बंगला चौराहा तक पहुंचा, जहां पर कुछ प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस ने धक्कामुक्की की और कुछ लोगों को हिरासत में ले लिया, हालांकि आंदोलनकारियों के दबाव में सबको छोड़ दिया. मार्च डाक बंगला चौराहे पर पहुंचने के बाद सभा में तब्दील हो गया. मार्च की मुख्य मांगों में उच्च शिक्षा में समान अवसर सुनिश्चित करना, जातिगत भेदभाव एवं उत्पीड़न के खिलाफ यूजीसी के नए रेगुलेशन को लागू करने, बिहार में विधानसभा से परित अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अत्यंत पिछड़ा वर्ग एवं पिछड़ा वर्गों के लिए 65% आरक्षण को लागू करने, कोलेजियम सिस्टम को समाप्त करने, संविधान विरोधी ईडब्ल्यूएस को खत्म करने, गरीबी विरोधी शिक्षा नीति 2020 को वापस लेने की मांग शामिल थी.
इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों को शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण और भेदभावपूर्ण नीतियों को छोड़कर समावेशी और न्यायपूर्ण व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए. सभा का संचालन फोरम के राज्य संयोजक रिंकू यादव ने किया एवं सांसद राजाराम सिंह ने सभा को संबोधित किया. उन्होंने कहा कि सड़क की इस आवाज को संसद में मजबूती से उठाएंगे और इस बार सामाजिक न्याय की जो लड़ाई छिड़ी है वो निर्णायक मंजिल तक पहुंचेगी. दरअसल, एक बार बिहार फिर से सामाजिक न्याय और लोकतंत्र के अग्रिम चौकी के बतौर खड़ा होगा.