• जब ममता के सिर पर रॉड मारी, लगा बचेगी नहीं : बंगाल में जो आता है, क्यों छा जाता है, क्या अब बीजेपी की है बारी

    वर्ष 1990, अगस्त का महीना. ज्योति बसु की लेफ्ट सरकार ने बस किराया बढ़ा दिया. विरोध में लोग सड़कों पर उतर आए. भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस ने गोलियां चलाई और तीन लोग मारे गए. समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ कि यह रिपोर्ट :-
    कोलकाता, 16 अप्रैल 2026. कांग्रेस ने हड़ताल का ऐलान किया. दक्षिण कोलकाता के हाजरा इलाके से मार्च निकालने की जिम्मेदारी मिली बंगाल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी को.' माय अनफॉरगेटेबल मेमोरीज ' बुक में ममता लिखती हैं - ' हाजरा में  सीपीआई (एम ) कार्यकर्ताओं की एक टुकड़ी वहां पहले से मौजूद थी. जैसे ही हम आगे बढ़े, उन्होंने हमला कर दिया. सबसे पहले लालू आलम ने मेरे सिर पर लोहे की रॉड मारी. मैं खून से भीग गई. फिर कई और वार हुए. होश आया तो अस्पताल में थी. डॉक्टर को लग रहा था कि मौत तय है, लेकिन बच गई.

    इस घटना के 8 साल बाद 1998 में ममता ने कांग्रेस छोड़ दी और इसी वर्ष तृणमूल  यानी टीएमसी पार्टी बनाई. 2011 में टीएमसी ने  34 साल से सत्ता पर काबिज  लेफ्ट सरकार को उखाड़ फेंका और तब से बंगाल की सत्ता पर ममता बनर्जी का ही राज है. जैसे बंगाली रसगुल्ले की चाशनी कपड़ों पर गिर जाए, तो जल्दी छुटती नहीं है. वैसे ही बंगाल में एक बार जो सरकार में आता है, सालों तक टिकता है.

    आजादी के बाद से पश्चिम बंगाल में सिर्फ तीन पार्टियों ने सत्ता संभाली है. कांग्रेस ने 20 साल, सीपीआई (एम) ने 34 साल और टीएमसी ने 15 साल. यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक पैटर्न है.-- आखिर बंगाल में जो आता है, लंबे वक्त तक क्यों छा जाता है?

    दूसरा--- कांग्रेस, लेफ्ट, टीएमसी के बाद क्या बंगाल में अब बीजेपी की बारी है?
    पहले सवाल का जवाब इन पांच वजहों में छिपा है...
    ● वजह-1: बंगाल में सबसे बड़ा कैडर बेस:- आजादी के बाद देश के 12 प्रदेशों में  कांग्रेस लगातार 15 वर्ष तक सत्ता में रही. उनमें से एक पश्चिम बंगाल भी था. माना जाता है कि तब लोग कांग्रेस के आजादी दिलाने की कोशिश के लिए एहसानमंद थे.

    ● बंगाल का सोशल स्ट्रक्चर दो हिस्सों में  बंटा है. पहला -- भद्रलोक यानी जमींदार और शिक्षित मध्यम वर्ग. वहीं दूसरा है--- भूमिहीन किसान और मजदूर. कांग्रेस ने भद्रलोक के जरिए राज्य में पकड़ बनाई.

    ● लेकिन यह पकड़ टॉप-- टु -- बॉटम थी, यानी ऊपर से नीचे की ओर. इसलिए जब लेफ्ट ने जमीनी काम शुरू कर मजदूरों, किसानों और गरीबों को लामबंद किया, तो कांग्रेस  टिक नहीं पाई. 1977 के बाद से कांग्रेस बंगाल की सत्ता में नहीं लौटी. लेफ्ट सरकार के दौरान बंगाल में ' कैडर राज ' शुरू हुआ. हर गांव, मोहल्ले, बूथ पर 
     पार्टी पहुंची. कार्यकर्ता नियुक्त हुए, जो मतदाताओं की मांगें सीधे कोलकाता तक पहुंचाते. 

    ●  कहा जाता है कि गांव- शहर में मौजूद पार्टी ऑफिस, सरकार से ज्यादा ताकतवर बन गया था. राशन कार्ड, सड़क, नौकरी, जमीन से लेकर पुलिस केस, झगड़े तक सब पार्टी तय करती थी.

    ● 2011 में टीएमसी  आई, तो उसने लिफ्ट की इसी मशीनरी को हथिया लिया. लेफ्ट ने आरोप लगाया था कि  2011 के चुनाव के बाद टीएमसी ने 1000 से ज्यादा दफ्तरों पर कब्जा कर लिया.

    ● लोकल क्लब, बस्ती के नेताओं को टीएमसी ने  रातों-रात पार्टी में शामिल कर लिया. सत्ता में आकर ममता ने लोकल कल्बो को सरकारी फंड और पावर देकर अपना वफादार बना लिया.

    ● आज भी कहा जाता है कि टीएमसी पार्टी और कैडर की मंजूरी के बिना सरकार कोई फैसला नहीं करती.

    वजह--2: दिल्ली बनाम बंगाल का नॉरेटिव 
    ● बंगाल के लोगों के दिल में एक बात गहरी बैठी है-- हम बंगाली हैं और दिल्ली हमें समझती नहीं.

    ● लेफ्ट ने इसी भावना को राजनीतिक हथियार बनाया.1980 में इंदिरा गांधी के सत्ता में आने के बाद ज्योति बसु ने नॉरेटिव बनाया कि दिल्ली कभी भी हमारी चुनी हुई सरकार को बर्खास्त कर सकती है.

    ● हल्दिया पेट्रोकेमिकल्स से लेकर बरकेश्वर थर्मल पावर स्टेशन तक केंद्र के ' भेदभाव ' की हर मिसाल गिनाई गई. 34 वर्ष यही ढोल पीटा गया.

    ● ममता बनर्जी ने इस नॉरेटिव को एक कदम और आगे ले जाकर इसे अपने टीएमसी नेताओं के भ्रष्टाचार के आरोपों से  बचाव की ढाल बना लिया.

    ● सीबीआई जब पुलिस कमिश्नर के घर पहुंची, तो ममता ने धरना दिया. मनरेगा और पीएम आवास का फंड रोकने का आरोप लगाया. इसे 'आर्थिक नाकेबंदी ' करार दिया.

    ●  2020 में बीजेपी की बढ़ती ताकत के जवाब में ममता ने चुनाव को 'बंगाली बनाम बाहरी ' में बदल दिया और यह काम आया.

    वजह--3: पर्सनैलिटी कल्ट यानी चेहरे को चुनता है बंगाल 

    बंगाल के चुनाव हमेशा एक चेहरे के इर्द-गिर्द घूमते हैं...---

    डॉ बिधानचंद्र रॉय : महात्मा गांधी और नेहरू के पर्सनल डॉक्टर रहे. 'आधुनिक बंगाल के निर्माता' कहलाए. बिधाननगर, कल्याणी, दुर्गापुर जैसे शहर, आईआईटी खरगपुर जैसी संस्थाएं उनकी विरासत है. उनके चेहरे पर कांग्रेस ने 14 साल राज किया.
    ज्योति बसु : एक स्टेट्समैन जो किसी व्यक्तिगत कल्ट में यकीन नहीं करते थे, फिर भी उनका कल्ट बन गया 1996 में पीएम का ऑफर मिला, पार्टी में विवाद हुआ तो ठुकरा दिया. उनके चेहरे पर लेफ्ट ने लगातार पांच चुनाव जीते, 23 साल से ज्यादा मुख्यमंत्री रहे.

    ममता बनर्जी: हवाई चप्पल, सूती साड़ी और सीधा आम आदमी से कनेक्शन. लोग टीएमसी को नहीं, 'दीदी' को वोट देते हैं. 2021 में नारा दिया---'बंग्ला निजेर मेयकेई चाये ' यानी बंगाल अपनी बेटी चाहता है. तीन बार लगातार सरकार बनाई.