जब हिंदी साहित्य में आम आदमी बना सबसे बड़ा नायक
मुंशी प्रेमचंद जयंती पर विशेष: देहाती विश्वनाथ
प्रेमचंद की कहानियां सिर्फ अपने समय की नहीं है. उनमें गरीबी, असमानता, शिक्षा, महिलाओं की स्थिति, किसानों की समस्याएं, ईमानदारी, लालच और सामाजिक न्याय जैसे सवाल हैं, जो आज भी हमारे समाज के सामने मौजूद हैं.
हैदराबाद, 1 अगस्त 2026। एक सदी बाद भी जब कोई गोदान, ईदगाह, पूस की रात, कफन या नमक का दरोगा पढ़ता है, तो उसे लगता है कि यह कहानी किसी इतिहास की नहीं, बल्कि आज के भारत की भी हो सकती है. 31 जुलाई, शुक्रवार मुंशी प्रेमचंद की जयंती थी. हर साल उनकी कहानियों और उपन्यासों की चर्चा होती है, लेकिन प्रेमचंद की सबसे बड़ी पहचान सिर्फ एक महान लेखक होना नहीं है. उनकी सबसे बड़ी ताकत यह थी कि उन्होंने उन लोगों को अपनी कहानियों का नायक बनाया, जिनकी आवाज साहित्य में लगभग सुनाई नहीं देती थी. किसान, मजदूर, विधवा, दलित, निम्न मध्यम वर्ग, बेरोजगार, नौजवान और छोटे सरकारी कर्मचारी- ये सभी प्रेमचंद की दुनिया के असली पात्र थे. यही वजह है कि उनकी रचनाएं सौ साल बाद भी नई लगती है.
बचपन का संघर्ष ही बना उनकी लेखनी की ताकत
31 जुलाई 1880 को वाराणसी के पास लमही गांव में जन्मे प्रेमचंद का वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था. उनके पिता डाक विभाग में एक छोटे कर्मचारी थे. आर्थिक स्थिति साधारण थी. जब प्रेमचंद 8 वर्ष के थे, तब उनकी मां का निधन हो गया. किशोरावस्था में ही पिता भी चल बसे. कम उम्र में ही घर की जिम्मेदारियां उनके कंधों पर आ गई. पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्होंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया. यही संघर्ष आगे चलकर उसकी कहानियों की संवेदना बना.
एक किताब ने बदल दी जिंदगी
प्रेमचंद बचपन से ही पढ़ने के बेहद शौकीन थे. कहा जाता है कि वे किताबें उधार लेकर पढ़ते थे और मौका मिलते ही नए-नए उपन्यास खोजते थे. इसी दौरान उन्होंने एक किताब का गहराई से अध्ययन किया और इस गहरे अध्ययन ने उनके भीतर लेखक और साहित्यकार बनने की इच्छा जगा दी. बाद में उन्होंने शिक्षक की नौकरी की और फिर स्कूलों में निरीक्षक (डिप्टी सब इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स ) जैसे पद पर भी काम किया. सरकारी नौकरी ने उन्हें गांव और छोटे कस्बों को करीब से देखने का मौका दिया. यही अनुभव आगे चलकर गोदान, रंगभूमि और निर्मला जैसी रचनाओं में दिखाई देते हैं.
नवाब राय से प्रेमचंद बनने की कहानी
बहुत कम लोग जानते हैं कि प्रेमचंद ने शुरुआत में नवाब राय नाम से लिखना शुरू किया था. 1908 में उनकी उर्दू कहानियों का संग्रह ' सोज -- ए -- वतन ' प्रकाशित हुआ. उस समय भारत पर अंग्रेजी शासन था. इस पुस्तक की कहानियों में देशभक्ति की भावना थी. ब्रिटिश सरकार ने इस आपत्तिजनक मानते हुए इसकी प्रतियां जब्त कर ली और आगे इस नाम से लिखने पर आपत्ति जताई. इसके बाद उन्होंने नया नाम चुना प्रेमचंद.
यही नाम आगे चलकर हिंदी और उर्दू साहित्य में अमर हो गया. हालांकि, प्रेमचंद का निधन 8 अक्टूबर 1936 को वाराणसी में हुआ. मृत्यु से कुछ समय पहले तक भी प्रेमचंद लिखते रहे. उनका अधूरा उपन्यास 'मंगलसूत्र ' उनके अंतिम लेखन प्रयासों में गिना जाता है. उन्हें शत-शत नमन!