• 400 साल पुरानी परंपरा! जानिए मोहर्रम में हाथी पर क्यों निकाला जाता है बीबी की अलम

    हैदराबाद में मोहर्रम की  दसवीं तारीख को निकलने वाला बीवी अलम जुलूस 400 साल पुरानी ऐतिहासिक और धार्मिक परंपरा का प्रतीक है. इसकी शुरुआत कुतुब शाही शासनकाल में हुई थी और इसे हयात बक्शी बेगम से जोड़ा जाता है. इस अलम में हजरत फातिमा- ए - जेहरा से जुड़ा पवित्र तबर्रुक शामिल माना जाता है. कुतुब शाही और बाद में निजाम शासकों ने इस परंपरा को संरक्षण दिया. शाही हाथियों पर निकलने वाला यह जुलूस  आज भी लाखों लोगों की आस्था का केंद्र है और हैदराबाद की गंगा जामुनी तहजीब की अनूठी विशाल पेश करता है. समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ  की यह विशेष रिपोर्ट:-

    हैदराबाद, 30 जून 2026. चारमीनार के साए में हर साल मोहर्रम की दसवीं तारीख यानी यौम - ए - आशूरा को निकलने वाला बीबी का अलम जुलूस सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि हैदराबाद की   गंगा- जामुनी तहजीब और 4 साल पुराने शाही इतिहास का जीवंत प्रतीक है. कुतुब शाही दौर से शुरू हुई यह ऐतिहासिक रिवायत आज भी अपने उसी पुराने रस्म - ओ - रिवाज़ और अकीदत यानी आस्था के साथ जारी है. इस बेहद पाक और ऐतिहासिक जुलूस की शुरुआत गोलकुंडा के कुतुब शाही राजवंश के दौरान हुई थी. माना जाता है कि राजा अब्दुल्ला कुतुब शाह की वालिदा, हयात बक्शी बेगम ने इस जुलूस की नींव रखी थी.

    इस अलम में पैगंबर मोहम्मद की साहबजादी हजरत फातिमा - ए - जेहरा के पवित्र तबर्रुक यानी लकड़ी के तख्त का एक हिस्सा को शामिल किया गया है. कुतुब शाही राजाओं के बाद, हैदराबाद के आसफ जाही शासकों ने यानी निजामों ने भी इस परंपरा को  पूरे राजकीय सम्मान के साथ आगे बढ़ाया और इसे दबीरपुरा के बीबी का अलावा में स्थापित किया.

    दक्कन के दरबारों में सम्मान और गरिमा का प्रतीक माना जाता था

    इस ऐतिहासिक जुलूस की सबसे बड़ी खासियत इसके लिए इस्तेमाल होने वाले शाही हाथी रहे हैं. दक्कन के दरबारों में हाथियों को सर्वोच्च राजकीय सम्मान और गरिमा का प्रतीक माना जाता था. इसी वजह से इस मुकद्दस यानी पवित्र अलम को हमेशा एक सजे - धजे शाही हाथी पर ही ले जाया जाता है. इतिहास के पन्नों को पलटें तो  दशकों पहले इस जिम्मेदारी को हैदरी नाम का एक प्रसिद्ध हाथी निभाता था. हैदरी के बाद, यह गौरवशाली परंपरा उसकी संतान रजनी नाम का हथिनी ने संभाली, जिसने सालों तक पुराने शहर की गलियों में इस पवित्र अलम को अपने कंधे पर उठाया. बीच के कुछ वर्षों में हाशमी नाम के हाथी ने भी इस सेवा को पूरा किया.

    रजनी हथनी मोहर्रम के इस पाक जुलूस का हिस्सा बनती रही, हालांकि, हैदराबाद के पारंपरिक बोनालु उत्सव में भी बढ़ चढ़कर शामिल होती रही जो शहर के सांप्रदायिक सौहार्द को दर्शाता है. वक्त के साथ भले ही हाथियों की बढ़ती उम्र और फिटनेस के कारण अब दूसरे राज्यों जैसे महाराष्ट्र से प्रशिक्षित हाथियों को इसके लिए लाया जाने लगा हो, लेकिन अकीदत का यह करवां आज भी वैसा ही है. आज भी जब यह जुलूस निकलता है, तो जात - पात और मजहब से परे, हजारों - लाखों लोग  इस शाही और रूहानी परंपरा के दीदार के लिए उमड़ पड़ते हैं.