टीएमसी के दोनों गुटों में 21 जुलाई पर शहीद दिवस रैली के लिए मची होड़? ममता की 1993 से इस कहानी में बसी है जान
कोलकाता में 21 जुलाई की 'शहीद दिवस ' रैली को लेकर टीमसी के दो गुटों में वर्चस्व की जंग छिड़ गई है. 1993 की यादों से जुड़ी इस रैली पर पुलिस ने सुरक्षा का हवाला देते हुए पाबंदी लगा दिया है. प्रशासन ने विक्टोरिया हाउस और बीबीडी बाग के आसपास 60 दिनों के लिए धारा 163 लागू कर दी है, जिससे पार्टी की मुश्किलें बढ़ गई है. आखिर 21 जुलाई की 'शहीद दिवस ' की क्या है कहानी. जिसमें ममता बनर्जी की बसी है जान. समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ यह विशेष रिपोर्ट:-
कोलकाता, 2 जुलाई 2026. कोलकाता की राजनीति में इन दिनों 21 जुलाई का ' शहीद दिवस ' चर्चा का मुख्य केंद्र बना हुआ है. टीएमसी के लिए यह दिन केवल एक तारीख नहीं, बल्कि पार्टी की आत्मा है. इस साल ममता बनर्जी का अधिकारिक खेमा पार्टी का बागी गुट, दोनों ही इस रैली पर अपना दावा ठोक रहे हैं. दोनों की होड़ ने पार्टी के भीतर की दरार को सार्वजनिक कर दिया है. प्रशासन ने पूरे इलाके में धारा 163 लागू कर किसी भी गुट को अनुमति देने से इनकार कर दिया है. तो जानते हैं आखिर क्या है 21 जुलाई को मनाए जाने वाला शहीद दिवस, जिसको लेकर टीएमसी के दोनों गुटों में होड़ मची हुई है.
1993 कि वह खूनी याद
बात साल 1993 जुलाई की है. जब पुलिस की गोलीबारी से 13 युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने अपनी जान गंवा दी थी. उस समय ममता बनर्जी युवा कांग्रेस की तेज- तर्रार नेता थी. वह भी इस आंदोलन का चेहरा थी. यह घटना ममता बनर्जी के सियासी करियर का वह मोड़ था, जिसने उन्हें बंगाल की राजनीति में 'दीदी ' के तौर पर स्थापित कर दिया. तब से लेकर आज तक ममता बनर्जी इस दिन को अपने राजनीतिक संघर्ष के सबसे बड़े सम्मान के तौर पर मनाती आई है. उनके लिए यह दिन पार्टी की नींव जैसा है.
सत्ता का असली वारिस कौन?
उधर, टीएमसी के दोनों गुटों के बीच मची यह होड़ केवल रैली के लिए नहीं है, लड़की यह इस बात की लड़ाई है कि 'असली टीएमसी' किसके साथ है. ममता बनर्जी के समर्थक इसे अपनी पुरानी विरासत मानते हैं. जबकि बागी गुट इसे नई शुरुआत के तौर पर पेश करना चाहता है. दोनों खेमे अपने- अपने स्तर पर 'शक्ति प्रदर्शन ' की तैयारी कर रहे थे, लेकिन पुलिस की सख्ती ने उनकी योजनाओं पर पानी फेर दिया. इस लड़ाई में कार्यकर्ताओं के बीच भारी भ्रम की स्थिति बनी हुई है कि वे किस गुट के झंडे के नीचे जुटें.
पुलिस की सख्ती और प्रशासन का रूख
कोलकाता पुलिस आयुक्त ने स्पष्ट कर दिया है कि सुरक्षा और आम जनता की सहूलियत से ऊपर कुछ भी नहीं है. विक्टोरिया हाउस के पास का इलाका बहुत भीड़भाड़ वाला है. प्रशासन ने वहां धारा 163 लगा दी है, जिससे वहां 5 से अधिक लोग एक साथ इकट्ठे नहीं हो सकते. पुलिस का मानना है कि दोनों गुटों के बीच संभावित टकराव से शहर की शांति भंग हो सकती है. इस फैसले से टीएमसी नेताओं में भारी आक्रोश है, जो इसे पुलिस की मनमानी बता रहे हैं.
कानूनी लड़ाई की तैयारी
पुलिस की ओर से अनुमति नहीं मिलने के बाद टीएमसी के वरिष्ठ नेताओं ने अब अदालती रास्ता अपनाने का मन बना लिया है. पार्टी का कहना है कि यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है और रैली करने से कोई नहीं रोक सकता. दूसरी तरफ कानूनी जानकारों का मानना है कि टीएमसी के लिए अब यह रैली आयोजित करना एक बड़ी चुनौती है. यदि अदालत से राहत नहीं मिलती है, तो टीएमसी को किसी वैकल्पिक जगह की तलाश करनी होगी, जो उनके लिए राजनीतिक तौर से काफी चुनौतीपूर्ण होगा.
नेताओं पर बढ़ता पुलिस का शिकंजा
पुलिस ने रैली की तैयारी कर रहे टीएमसी के कई बड़े नेताओं के खिलाफ कार्रवाई भी शुरू कर दी है. ट्रैफिक बाधा डालने और सरकारी काम में रुकावट पैदा करने के आरोप में कुणाल घोष, डोला सेन और बैशनर चट्टोपाध्याय जैसे नेताओं को कानूनी नोटिस मिल चुके हैं. यह पहली बार है जब रैली की तैयारी के दौरान पुलिस इतनी सख्त दिखाई दी है. हालांकि, कार्यकर्ताओं के लिए यह स्थिति बहुत ही चुनौतीपूर्ण है क्योंकि वे ना तो पीछे हट पा रहे हैं और न ही सामने बढ़ने का रास्ता मिल रहा है.