• महान समाजवादी चिंतक जनेश्वर मिश्र एक याद!

    आज 5 अगस्त को महान समाजवादी चिंतक और 'छोटे लोहिया ' के नाम से प्रख्यात जनेश्वर मिश्र की जयंती है. उनका  जन्म 5 अगस्त 1933 को  यूपी के बलिया के शुभनथहीं गांव में हुआ था. सादगी, संघर्ष और  समाजवादी विचारधारा के लिए आजीवन समर्पित रहने वाले जनेश्वर मिश्र भारतीय राजनीति के एक ऐसे पुरोधा थे, जिनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था. समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की विशेष रिपोर्ट:-

    हैदराबाद, 5 अगस्त 2026. डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों से प्रभावित होकर जनेश्वर मिश्र छात्र जीवन से ही समाजवादी आंदोलन से जुड़ गए थे. इलाहाबाद विश्वविद्यालय ( प्रयागराज) में अपनी पढ़ाई के दौरान उन्होंने छात्र राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई. अनेक ओजस्वी  भाषणों और वैचारिक  दृढता को देखकर जनता और उनके साथियों ने उन्हें ' छोटे लोहिया ' की उपाधि दी.

    सादगी और  बेबाक राजनीति

    जनेश्वर मिश्र का पूरा जीवन गरीबों, पिछड़ों, किसानों और आम जनमानस के अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए बीता. वे देश के कई दिग्गज नेताओं जैसे मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, वीपी सिंह और चंद्रशेखर के मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण पदों पर रहे, लेकिन उनकी अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं थी.

    वैचारिक विरासत और प्रासंगिकता

    संसद से लेकर सड़क तक उन्होंने हमेशा जनहित के मुद्दों को उठाया. उनके भाषणों के दौरान संसद में गहरी खामोशी और  सम्मान का भाव रहता था. आज उनकी जयंती पर देश और हैदराबाद में उनके पुराने साथी सेवानिवृत्ति न्यायाधीश और प्रखर समाजवादी टी. गोपाल सिंह उन्हें याद कर रहा है और उनके दिखाए गए समानता और न्याय के मार्ग पर चलने का संकल्प ले रहा है.

    'छोटे लोहिया ' जनेश्वर मिश्र के  हैदराबाद में उनके पुराने साथी , सेवानिवृत्ति न्यायाधीश तथा लोहिया विचार मंच, हैदराबाद के अध्यक्ष टी. गोपाल सिंह कहते हैं- जनेश्वर मिश्र 'अंग्रेजी हटाओ आंदोलन' समेत कई आंदोलनों में समाजवादी जीव जनसभा का नेतृत्व किया. 1969 में फूलपुर  निर्वाचन क्षेत्र से उस वक्त के केंद्रीय मंत्री केशव देव मालवीय को पराजित कर पहली बार लोकसभा पहुंचे थे. बाद में वे पांच बार लोकसभा के और तीन बार राज्यसभा के भी सदस्य रहे. उन्हें यह अनूठी उपलब्धि हासिल थी कि  वे कांग्रेस और बीजेपी के अलावा बनी सभी सरकारों में केंद्रीय मंत्री परिषद के सदस्य रहे और कई बार जेल यात्राएं भी की.

    हैदराबाद में समाजवादी विचारक टी. गोपाल सिंह बताते हैं कि एक बार जब वे किसान आंदोलन के दौरान वाराणसी जेल में बंद थे, तभी उनकी पत्नी का देहांत हो गया. सरकार ने उन्हें अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए रिहा करने का निर्णय लिया, लेकिन जनेश्वर जी ने बाहर आने से इनकार कर दिया और मांग की कि आंदोलन के तहत गिरफ्तार हुए सभी साथियों को भी रिहा किया जाए. सरकार ने उनकी बात सुनी और सभी आंदोलनकारी को उनके साथ रिहा करने का फैसला किया और तभी जनेश्वर मिश्र  जेल से बाहर आए और अपनी पत्नी का अंतिम संस्कार किए. ऐसे थे 'छोटे लोहिया ' जनेश्वर जी.

    1978 में जनेश्वर मिश्र मिश्र लोहिया के प्रबल समर्थक रहे बद्री विशाल पित्ती के चुनाव प्रचार के सिलसिले में हैदराबाद आए  थे. वे यहां तीन दिन रहे और मैं भी उनके साथ पूरे समय रहा. टी. गोपाल सिंह ने कहा- एक दिन जनेश्वर जी ने उनसे कहा वे सुबह की सैर पर जाना चाहते हैं. इसके लिए पित्ती जी के घर से कार का इंतजाम करने की बात टी. गोपाल सिंह ने कही. लेकिन जनेश्वर मिश्र ने यह कहकर मना कर दिया कि चुनाव प्रचार के कारण सभी ड्राइवर थक गए होंगे और हमें उन्हें  परेशान नहीं करना चाहिए. और फिर हम ऑटो रिक्शा से सुबह की सैर पर  निकल पड़े. ऐसे थे जनेश्वर मिश्र.

    टी. गोपाल सिंह बताते हैं कि सुबह सर पर निकले छोटे लोहिया ने उनसे कहा कि  वे तीन दिनों से हैदराबाद में हैं, लेकिन मैंने उन्हें इडली सांभर नहीं खिलाया. फिर मैं उन्हें एक होटल ले गया और हम दोनों मिलकर इडली सांभर खाए. ऐसे थे जनेश्वर मिश्र. हालांकि, हमने नई दिल्ली स्थित उनके सरकारी बंगले में परिवार के किसी सदस्य को कभी देखा नहीं. लेकिन वहां बैठे कार्यकर्ता बतला रहे थे कि उनके निवास सभी पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए खुला घर जैसा था. वे उनके साथ सुबह की चाय पीते थे और उनकी समस्याओं पर चर्चा करते थे. ऐसे थे जनेश्वर मिश्र.

    जनता पार्टी की सरकार थी और बलिया में जनता पार्टी के राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान, चंद्रशेखर जी ने हमसे कहा कि लोहिया साहित्य बलिया लेकर आएँ. बद्री विशाल जी ने मुझे लोहिया साहित्य के साथ बलिया भेजा. उन्होंने हमारे ठहरने के लिए अपना आवंटित तंबू दे दिया. अगले दिन हमने लोहिया साहित्य का स्टॉल लगाया तो बहुत अधिक प्रतिक्रिया नहीं मिली. लोग चंद्रशेखर जी की  पुस्तकों के बारे में पूछ रहे थे. तभी जनेश्वर जी हमारे स्टॉल पर आए, लगभग 1 घंटे तक वहां बैठे रहे. कुछ पुस्तकें खरीदी. यह देखकर सैकड़ो पार्टी कार्यकर्ता वहां आ गए. आज की राजनीति में ऐसे कद और गुणों वाले राजनेता मिलना दुर्लभ है. आज उनकी जयंती पर हम उन्हें अपनी विनम्र  श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं.