• 'झर झर झरनों ने, मल्हार गुनगुनाया, मेघों ने गीत लिखे, फूलोंं ने गाया..'

    रायपुर, 17 जुलाई 2026। संकेत साहित्य समिति द्वारा वृंदावन हॉल रायपुर में बुधवार  15 जुलाई को वर्षा ऋतु के स्वागत में पावस काव्य -गोष्ठी आयोजित की गई। गोष्ठी में राजधानी सहित छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों से आए अनेक कवियों ने काव्य -पाठ किया।पावस ऋतु पर केन्द्रित  नयी चेतना, नयी परिकल्पना और नये विचारों से संबंधित कविताएँ पढ़ी गईं।सुप्रसिद्ध साहित्यकार  रायपुर निवासी गिरीश पंकज इस आयोजन के मुख्य अतिथि थे। अध्यक्षता प्रदेश के जाने -माने भाषा विज्ञानी और गीतकार रायपुर निवासी डॉ.चित्तरंजन कर ने की। रायपुर के ही वरिष्ठ साहित्यकार अरविंद मिश्रा और वरिष्ठ कवयित्री नीलिमा मिश्रा विशेष अतिथि के रूप में गोष्ठी में शामिल हुए। कार्यक्रम के आरंभ में माँ सरस्वती की पूजा अर्चना के बाद समिति द्वारा अतिथियों का अंगवस्त्र, एवं श्रीफल से सम्मान किया गया।

    संकेत साहित्य समिति के संस्थापक और प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. माणिक विश्वकर्मा 'नवरंग' ने स्वागत भाषण दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति, साहित्य और संगीत में पावस ऋतु का विशेष स्थान है। हमारे भारतीय साहित्य में इसे श्रृंगार और उमंग का मौसम माना गया है।

    डॉ. चित्तरंजन कर ने काव्य गोष्ठी को कविता की पाठशाला निरुपित करते हुए कहा कि इसमें रचनाकार की कच्ची रचनाओं को और पकने का अवसर प्राप्त होता है। गिरीश पंकज ने कहा कि नये चेहरे साहित्य की धरोहर होते हैं। उन्हें काव्य गोष्ठी में जरूर जाना चाहिए, सिर्फ़ कविता पढ़ने के लिए नहीं अपितु सिखने के उद्देश्य से भी। अरविन्द मिश्रा ने कहा कि काव्य गोष्ठी में कविता के अलावा ललित निबंध एवं लघु कथा का वाचन भी कभी -कभी होना चाहिए। नीलिमा मिश्रा ने प्रसिद्ध माहिया छंद पर बरसात की महत्ता को खूबसूरती से चित्रित करते हुए काव्य गोष्ठी की शुरुआत की।

    गोष्ठी में राज्य के विभिन्न जिलों से आए जिन कवियों और कवयित्रियों ने रोचक काव्य पाठ किया उनमें डॉ. चित्तरंजन कर, गिरीश पंकज, डॉ.माणिक विश्वकर्मा 'नवरंग', अरविंद मिश्रा, नीलिमा मिश्र, सुरेन्द्र रावल, रामेश्वर शर्मा, डॉ. दीनदयाल साहू, संजीव ठाकुर, डॉ. रविन्द्र सरकार, पल्लवी झा, पूर्वा श्रीवास्तव, सुषमा पटेल, हरीश कोटक, राजकुमार सोनी, छबिलाल सोनी, रूनाली चक्रवर्ती, यशवंत यदु, रविश गुप्ता, राजेन्द्र रायपुरी, विवेक राहटगाँवकर, अंबर शुक्ला 'अंबरीश', रामचंद्र श्रीवास्तव, एच.एल. चन्द्राकर, दिलीप वरवंडकर, सिद्धार्थ श्रीवास्तव, चेतन भारती, राजेन्द्र ओझा, कुमार जगदली, लतिका भावे, नर्मदा प्रसाद विश्वकर्मा, डॉ. मंजूला साहू, माधुरी कर, विभा पटेल, ज्योति रहाटगाँवकर, वीरेन्द्र शर्मा 'अनुज', शांता वर्मा, गोविंद दास, कमलजीत कौर, अर्चना श्रीवास्तव, अनिता झा, सीमा पांडे, दिलशाद सैफ़ी, डॉ. कोमल प्रसाद राठौर, डॉ. सीमा श्रीवास्तव एवं बलजीत कौर के नाम प्रमुख हैं।  गोष्ठी में पढ़ी गई कविताओं के कुछ प्रमुख अंश इस प्रकार हैं -
    ● गरीब की झोपड़ी में सीली हुई लकड़ी का धुआं 
       और चूल्हा न जला पाने की विवशता,
       बच्चों के पेट की आग ना बुझा पाने का अफसोस /
       तोड़ देता है उस गरीब को।
       किसी की आस और किसी का त्रास होती है बरसात।
                 -पूर्वा श्रीवास्तव 
               -------------
    ● ओ नभ मंडल में छाए मेघों, अब बरस भी जाओ।
       बाट जोहती प्यासी धरा, रिमझिम रस बरसाओ।।
    - दिलशाद सैफ़ी
    ------------
    ● मेघ बजायें ढोल नगाड़ें, बिजली की टंकार है। 
        छम-छम बूँदों की सरगम में, पायल की झंकार है।।
        नज़र उतारें काले बादल, शुभ धरती श्रृंगार है। 
        सीप सरीखे मोती बरसें, बूँदों का त्यौहार है 
    - पल्लवी झा (रूमा) 
     ---------------
    ● बरसात भी किसी राज की तरह होती है,
       बरसते ही कई छिपे हुए राज़ खोल देती है।
       कहीं खेतों में हरियाली का पैग़ाम लिखती है,
       कहीं शहरों की बदहाली का इल्ज़ाम लिखती है।
    - राजकुमार सोनी 
         ----------
    ● ये सावन है, मनभावन है। सबका मन हर्षाता है।           काले बादल झूम के बरसें। सबका दिल खिल जाता       है ।। सावन महीने की यारों। महिमा बड़ी निराली है।     जेठ में उजड़ी थी धरती । वो सावन में हरियाली है ।
    -छबि लाल सोनी
    ------------
    ● सूख जाने के बाद भी,
       पेड़ के पास/कुछ न कुछ बची रहती है/ 
       हरे होने की संभावना।
       जड़ें/बचा कर रखती है पानी/कि वक्त पड़े,
       वह सींच सके खुद को।
    -राजेंद्र ओझा
    -----------
    ● जल बिन मछरी कस जिनगी होगे अउ अधियागे।          जेठ असाढ़ म धरती ह तिपत तिपत भोभरागे।।
           --रामेश्वर शर्मा
    ----------------
    ● पनघट प्यासे हो गये
        सांसे जम गयीं।
        पुरवाई में सन्नाटा है,
        बरखा परदेशी हो गई
    - अरविंद मिश्रा
    -------------
    ● होने लगी है फिर से बरसात धीरे-धीरे।
    डसने लगी है नागिन ये रात धीरे -धीरे।।
    अब तो किसी बहाने आ जाओ पास 'नवरंग'
    अफ़साने बन रहे हैं हालात धीरे- धीरे।।
    -डॉ.माणिक विश्वकर्मा 'नवरंग'
    -----------
    ● झर झर झरनों ने, मल्हार गुनगुनाया।
       मेघों ने गीत लिखे, फूलोंं ने गाया।।
    - डॉ.चित्तरंजन कर
    ----------
    ● बादल भैया आओ-आओ, जल्दी से अब आओ/
      झुलस रही है धरती मैया,नदी रही है सूख/ 
      जलते पेड़ों को देखो तो, उठे हृदय में हूक /
      कर दो जल अभिसिंचन थोड़ा/ तुम उदार बन जाओ.
    -गिरीश पंकज
    -----------

    काव्य -गोष्ठी का संचालन पल्ल्वी झा ने किया। कार्यक्रम के अंत में संकेत साहित्य समिति के उपाध्यक्ष डॉ. दीनदयाल साहू ने आमंत्रित अतिथियों एवं रचनाकारों के प्रति आभार व्यक्त किया।
                                      ●●●●●