• तमिल के प्रख्यात कवि एवं साहित्यकार आर. वैरमुत्तु को जन्मदिन पर मिला 60वां ज्ञानपीठ पुरस्कार

    आर. वैरमुत्तु ने 37 से ज़्यादा किताबें लिखी हैं, जिनमें 'कल्लीकट्टू इथिहासम', 'करुवाची काव्यम' और 'थन्नी देसम' जैसे प्रसिद्ध रचनाएं शामिल हैं। उन्होंने तमिल सिनेमा में 8,000 से ज़्यादा गाने लिखे हैं, जिन्होंने लोकप्रिय संस्कृति को प्रभावित किया है। एक गीतकार के तौर पर बेहतरीन काम के लिए उन्हें सात बार सर्वश्रेष्ठ गीत के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला है।

    नई दिल्ली, 13 जुलाई 2026। तमिल के प्रख्यात कवि, साहित्यकार एवं गीतकार आर. वैरमुत्तु को 60 वें ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत किया गया। भारतीय साहित्य के सर्वोच्च सम्मान वर्ष 2025 के ज्ञानपीठ पुरस्कार सोमवार को नई दिल्ली स्थित चिन्मय मिशन सभागार में आयोजित एक गरिमामय समारोह में उन्हें दिया गया। भारत के वरिष्ठ राजनेता, प्रख्यात चिंतक एवं विद्वान डॉ. कर्ण सिंह ने तमिल सिनेमा के लिए 8000 से अधिक गाने लिखने वाले आर. वैरमुत्तु को अपने करकमलों से प्रदान किया। ज्ञानपीठ पुरस्कार के अंतर्गत उन्हें ₹11 लाख की नकद राशि, वाग्देवी (माँ सरस्वती) की कांस्य प्रतिमा तथा प्रशस्ति-पत्र प्रदान किया गया।

    इस अवसर पर भारतीय ज्ञानपीठ के न्यासी श्री मुदित जैन, प्रबंध न्यासी साहू अखिलेश जैन, ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रवर परिषद् की अध्यक्षा डॉ. प्रतिभा राय, महाप्रबंधक आर. एन. तिवारी, देशभर से आए साहित्यकार, विद्वान, लेखक, शिक्षाविद् तथा बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी उपस्थित थे।

    भारतीय ज्ञानपीठ के न्यासी श्री मुदित जैन ने स्वागत भाषण में कहा कि ज्ञानपीठ पुरस्कार भारतीय भाषाओं की समृद्ध साहित्यिक परंपरा, सांस्कृतिक विविधता और राष्ट्रीय एकात्मता का प्रतीक है। उन्होंने श्री आर. वैरमुत्तु के साहित्यिक अवदान को भारतीय साहित्य की अमूल्य धरोहर बताते हुए उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया।

    अपने संबोधन में डॉ. प्रतिभा राय ने कहा कि श्री वैरमुत्तु की साहित्य-साधना भारतीय भाषाओं की साझा सांस्कृतिक चेतना का सशक्त प्रतिनिधित्व करती है। उनकी रचनाएँ भाषा की सीमाओं से आगे बढ़कर भारतीय साहित्य की बहुभाषिक परंपरा को नई ऊर्जा प्रदान करती हैं।

    पुरस्कार ग्रहण करने के उपरांत आर. वैरमुत्तु ने भारतीय ज्ञानपीठ के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह सम्मान केवल उनका व्यक्तिगत सम्मान नहीं, बल्कि तमिल भाषा और समूचे भारतीय साहित्य का सम्मान है। उन्होंने अपने संघर्षपूर्ण जीवन और साहित्य-साधना का उल्लेख करते हुए कहा कि साहित्य मानवता की आशा, संवेदना और नैतिक शक्ति का सबसे बड़ा आधार है तथा यह सम्मान उन्हें और अधिक सृजन के लिए प्रेरित करेगा।

    मुख्य अतिथि डॉ. कर्ण सिंह ने अपने उद्बोधन में कहा कि ज्ञानपीठ पुरस्कार भारतीय साहित्य की अखंड परंपरा, भाषाई विविधता और राष्ट्रीय एकात्मता का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञानपीठ ने अपनी स्थापना के समय जिन उद्देश्यों-भारतीय भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य के संरक्षण, संवर्धन तथा समकालीन सृजनधर्मिता को प्रोत्साहन-को अपनाया था, उन्हें छह दशकों से अधिक समय से पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ाया है। उन्होंने कहा कि आज विज्ञान और प्रौद्योगिकी के युग में भी साहित्य ही मनुष्य को संवेदनशील, सहिष्णु और मानवीय बनाए रखता है। उन्होंने युवा पीढ़ी से भारतीय भाषाओं और साहित्य से आत्मीय संबंध स्थापित करने का आह्वान किया।

    समारोह का एक विशेष संयोग यह भी रहा कि 13 जुलाई को ही आर. वैरमुत्तु का जन्मदिवस था। भारतीय ज्ञानपीठ परिवार ने उन्हें जन्मदिवस की शुभकामनाएँ देते हुए इस अवसर को साहित्य और संस्कृति का ऐतिहासिक उत्सव बताया।

    कौन हैं आर. वैरमुत्तु..

    आर. वैरमुत्तु समकालीन तमिल साहित्य के एक प्रमुख व्यक्ति हैं। वे एक कवि, गीतकार और लेखक के तौर पर जाने जाते हैं और उन्होंने कविता, उपन्यास और फ़िल्मी गानों के क्षेत्र में योगदान दिया है। उनकी रचनाएँ अपनी भावनात्मक गहराई, सामाजिक सरोकारों और प्रकृति व ग्रामीण जीवन से गहरे जुड़ाव के लिए जानी जाती हैं।

    ● उनका जन्म 13 जुलाई 1953 को तमिलनाडु में हुआ था। 

    ● उन्होंने 37 से ज़्यादा किताबें लिखी हैं, जिनमें 'कल्लीकट्टू इथिहासम', 'करुवाची काव्यम' और 'थन्नी देसम' शामिल हैं।

    ● उन्होंने तमिल सिनेमा में 8,000 से ज़्यादा गाने लिखे हैं, जिन्होंने लोकप्रिय संस्कृति को प्रभावित किया है।

    ● एक गीतकार के तौर पर बेहतरीन काम के लिए उन्हें सात बार सर्वश्रेष्ठ गीत के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला है।

    ● उन्हें 'कल्लीकट्टू इथिहासम' के लिए 2003 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

    ● भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री (2003) और पद्म भूषण (2014) से सम्मानित किया।

    ● उन्हें एक ऐसे लेखक के तौर पर देखा जाता है जो शास्त्रीय तमिल साहित्यिक परंपराओं और आधुनिक अभिव्यक्ति के बीच सेतु का काम करते हैं.

    भारतीय साहित्य के सर्वोच्च सम्मान

    भारतीय ज्ञानपीठ की स्थापना वर्ष 1944 में भारतीय भाषाओं, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से की गई थी। ज्ञानपीठ पुरस्कार, जिसकी स्थापना वर्ष 1961 में हुई, भारतीय साहित्य का सर्वोच्च सम्मान माना जाता है। यह पुरस्कार भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित भाषाओं के किसी लेखक को भारतीय साहित्य में उनके आजीवन उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रदान किया जाता है। वर्ष 1965 से अब तक 60 वर्षों में 66 साहित्यकार इस प्रतिष्ठित सम्मान से अलंकृत हो चुके हैं। वर्ष 2024 का 59 वां भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार छत्तीसगढ़ के लेखक विनोद कुमार शुक्ल को दिया गया था।

    समारोह के अंत में भारतीय ज्ञानपीठ के महाप्रबंधक आर. एन. तिवारी ने सभी अतिथियों, साहित्यकारों, मीडिया प्रतिनिधियों तथा आयोजन में सहयोग देने वाले सभी व्यक्तियों के प्रति आभार व्यक्त किया।