खनिज संपदा की बढ़ती कीमत और बढ़ता रक्तपात, क्या छत्तीसगढ़ एक खतरनाक मोड़ पर खड़ा है?
विशेष टिप्पणी- जयदास मानिकपुरी
छत्तीसगढ़ को देश के सबसे समृद्ध खनिज राज्यों में गिना जाता है। यहां कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, चूना पत्थर और रेत जैसे संसाधनों की भरमार है। यही संपदा प्रदेश के विकास और निवेश का आधार भी बन रही है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक चिंताजनक प्रवृत्ति भी सामने आई है। खनिज और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े विवाद अब केवल कारोबारी प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रह गए हैं बल्कि कई मामलों में हिंसा और जानलेवा संघर्ष का रूप ले रहे हैं। पिछले दिनों जांजगीर-चांपा जिले के करही गांव में कश्यप परिवार पर हुई गोलीबारी की घटना इसी चिंता को और गहरा करती है।
अप्रैल 2026 में कांग्रेस नेता और रेत कारोबार से जुड़े सम्मेलाल कश्यप के घर में घुसकर हमलावरों ने उनके पुत्र आयुष कश्यप की हत्या कर दी और एक अन्य सदस्य को गंभीर रूप से घायल कर दिया। यह हमला किसी सड़क या सार्वजनिक स्थल पर नहीं बल्कि घर के भीतर हुआ था जिसने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया। पुलिस जांच अपने रास्ते पर है और मामले के अलग-अलग पहलुओं की पड़ताल हो रही है। लेकिन यह तथ्य भी चर्चा में रहा कि परिवार का संबंध रेत कारोबार से था। ऐसे में यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं बल्कि उस बढ़ते तनाव की तरफ भी इशारा करती है जो प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े आर्थिक हितों के इर्द-गिर्द बन रहा है।
इसी तरह कोरिया जिले में रेत उत्खनन और उससे जुड़े विवाद में भाजपा नेता भरत सिंह गहरवार और उनके करीबी वीरू सिंह गहरवार की हत्या ने पूरे प्रदेश का ध्यान खींचा। एक अन्य व्यक्ति की वाहन में जलकर मौत हुई और कई लोग घायल हुए। यह घटना भी संसाधनों और वर्चस्व की लड़ाई के खतरनाक रूप को सामने लाती है। यदि इन घटनाओं को अलग-अलग अपराध मानकर छोड़ दिया जाए तो शायद तस्वीर अधूरी रह जाएगी। लेकिन जब रेत, खनिज, उत्खनन, परिवहन और संसाधनों के नियंत्रण से जुड़े मामलों में बार-बार हिंसक टकराव दिखाई देने लगें तब समाज को व्यापक रूप में सोचने की जरूरत होती है।
रेत आज केवल निर्माण सामग्री नहीं रह गई है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण और निर्माण कार्यों के कारण इसकी आर्थिक कीमत बढ़ी है। जहां पैसा बढ़ता है वहां प्रतिस्पर्धा भी बढ़ती है। प्रतिस्पर्धा जब नियमों और कानून के दायरे में रहे तो विकास का माध्यम बनती है लेकिन जब यह वर्चस्व और शक्ति प्रदर्शन की लड़ाई में बदलने लगे तो परिणाम समाज के लिए घातक होते हैं। चिंता की बात यह नहीं कि कारोबार हो रहा है। चिंता इस बात की है कि कहीं कारोबार के साथ हिंसा की संस्कृति भी तो नहीं बढ़ रही। गांवों में गुटबाजी स्थानीय प्रभाव की लड़ाई आर्थिक हितों का टकराव और राजनीतिक संरक्षण की चर्चाएं अक्सर ऐसे मामलों के बाद सामने आती हैं। इससे आम नागरिक के मन में असुरक्षा की भावना पैदा होती है।
छत्तीसगढ़ आज निवेश और औद्योगिक विकास के नए दौर में प्रवेश कर रहा है। बड़े उद्योग आ रहे हैं खनिज क्षेत्रों में गतिविधियां बढ़ रही हैं और संसाधनों का आर्थिक महत्व लगातार बढ़ रहा है। ऐसे समय में यह सुनिश्चित करना और भी जरूरी हो जाता है कि संसाधनों की दौड़ कानून के दायरे में रहे न कि बंदूक और हिंसा के साये में। जांजगीर का कश्यप गोलीकांड और कोरिया की हत्याएं केवल पुलिस केस नहीं हैं। ये घटनाएं चेतावनी देती हैं कि यदि संसाधनों से जुड़े विवादों का समय रहते संस्थागत और कानूनी समाधान नहीं खोजा गया तो खनिज संपदा से समृद्ध प्रदेश में सामाजिक तनाव और संघर्ष की घटनाएं बढ़ सकती हैं।