• पार्टी में टूट के बाद कौन बना और कौन मिटा? कांग्रेस से लेकर शिवसेना  तक, बगावत का दिलचस्प रिकॉर्ड

    भारत का राजनीतिक इतिहास गवाह है कि वैचारिक मतभेद बढ़े हैं, तब - तब देश की सियासत पूरी तरह बदली है. आइए इतिहास के ऐसे पन्नों पर नजर डालते हैं. समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की तथ्यात्मक रिपोर्ट:-

    नई दिल्ली, 17 जून 2026. पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र की सियासत में इन दिनों सियासी गर्माहट 7 वें आसमान पर है. एक तरफ बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर सुलगती अंदरूनी कलह ने राज्य के राजनीतिक पारे को चरम पर पहुंचा दिया है. वहीं, टीएमसी नेताओं के बगावती तेवर से शुरू हुई राजनीति के इस विवाद में अब आरोप प्रत्यारोप की आक्रामक राजनीति और तीखे बयानों के तीर खुलकर चल रहे हैं. दूसरी तरफ महाराष्ट्र में एक बार फिर उद्धव ठाकरे गुटकी शिवसेना के सामने चुनौतियों का अंबार खड़ा हो गया है.

    राजनीतिक गलियारों में यह कैसी सुगबुगाहट?
    वर्तमान परिस्थितियां तो गवाही इस बात का भी दे रही है कि इस सत्ता संघर्ष में बल, बुद्धि और बगावत, इन तीनों का एक अभूतपूर्व संगम देखने को मिल रहा है. ऐसे में राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर चर्चा तेज है कि क्या टीएमसी और शिवसेना भी  उसी राह पर बढ़ रही है, जहां देश की कई बड़ी पार्टियों का वजूद आंतरिक बगावत के कारण दो हिस्सों में बंट गया?.

    भारतीय राजनीति में पार्टी टूटने का इतिहास

    इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में राजनीतिक दलों का टूटना या वैचारिक मतभेदों के कारण 'विभाजन' होना कोई नई बात नहीं है. बीते  पांच दशकों में कई ऐसे बड़े राजनीतिक घटनाक्रम हुए हैं, जिन्होंने न सिर्फ पार्टियों को बदला, बल्कि देश की राजनीति की दिशा और दशा दोनों को हमेशा के लिए बदल दिया.

    1969 का दौर और कांग्रेस का ऐतिहासिक विभाजन

    भारतीय राजनीति का सबसे पहला और ऐतिहासिक रूप से सबसे प्रभावशाली विभाजन वर्ष 1969 में हुआ था. तत्कालीन प्रधानमंत्री  इंदिरा गांधी और कांग्रेस के पुराने एवं अनुभवी नेताओं के गुट (जिसे सिंडिकेट कहा जाता था) के बीच मतभेद गहरा गए थे. यह विवाद राष्ट्रपति जाकिर हुसैन के निधन के बाद नए राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर शुरू हुआ.

    जब दो  धड़ों में बंट गई थी कांग्रेस

    कारण था इंदिरा गांधी ने निर्दलीय उम्मीदवार बीवी गिरी का समर्थन किया, जबकि कांग्रेस संगठन ने नीलम संजीव रेड्डी को मैदान में उतारा था. ऐसे में इस टकराव के कारण  दो धड़ों में बंट गई -- कांग्रेस (ऑर्गेनाइजेशन) और कांग्रेस (रिकॉग्निशन ). अंततः इंदिरा गांधी का  गुट असली कांग्रेस के रूप में उभरा और 1971 के लोकसभा चुनावों में भारी जीत दर्ज की. दूसरी तरफ पुराना सिंडिकेट गुट धीरे-धीरे कमजोर होता गया और 1977 में जनता पार्टी में विलीन हो गया.
    जनता पार्टी का बिखराव 
    1975 की आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी के विरोध में कई विपक्षी दलों ने मिलकर 1977 में ' जनता पार्टी' का गठन किया था. लेकिन वैचारिक मतभेद और नेतृत्व की महत्वाकांक्षा के कारण यह गठबंधन अधिक दिन नहीं चल सका.