• ममता को कांग्रेस का ऑफर, अपने पुराने मूल में लौट आइए, रणनीति की तैयारी तेज

    बीजेपी की भगवा आंधी में छत्रपों की बुरी तरह से हार के बाद देश की राजनीति में विपक्ष एक नई रणनीति पर काम कर रहा है. अगर यह रणनीति काम कर गई तो इससे देश की सियासत पूरी तरह से बदल सकती है. बंगाल के अलावा पंजाब और आंध्र प्रदेश को लेकर भी चर्चा तेज है. समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की यह विशेष रिपोर्ट :-
    नई दिल्ली, 8 जून 2026. राष्ट्रीय राजनीति के कैनवास पर एक ऐसी पटकथा  लिखी जा रही, जो आने वाले दिनों में देश की सियासत का  पूरा भूगोल बदल सकती है. पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों ने क्षेत्रीय छत्रपों की ताकत के जिस सबसे मजबूत केले को ध्वस्त किया है, उसके बाद अब कांग्रेस से टूटकर बनी पार्टियों  के विलय और पुराने दिग्गजों की घर वापसी के योजना पर शीर्ष स्तर पर बेहद रणनीतिक तरीके से काम शुरू हो चुका है. इस बिसात पर सबसे बड़ा धमाका पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी को लेकर हुआ है.

    प्रमाणिक सूत्रों के हवाले से खबर है कि कांग्रेस आला कमान की ओर से  ममता बनर्जी को तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस में पूर्ण विलय करने का सीधा और बड़ा ऑफर दिया गया है. संयोग और रणनीति का तकाजा देखिए कि आज यानी 8 जून, सोमवार को दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन भवन में विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक की बेहद महत्वपूर्ण बैठक चल रही है और इस बैठक में ममता बनर्जी भी मौजूद हैं . माना जा रहा है कि चुनावी पराजय के बाद यह पहला मौका होगा, जब ममता बनर्जी के  कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व सोनिया गांधी और राहुल गांधी के साथ सीधे मेज पर बातचीत होगी.

    चौतरफा  दबाव में  घिरी तृणमूल , सियासत तेज 
    तृणमूल कांग्रेस के गहरे दबाव में होने की कई बड़ी वजहें हैं. सत्ता हाथ से  जाते ही बंगाल में बरसों से जारी वर्चस्व और कथित  अराजकता का जो माहौल था, उसकी प्रतिक्रिया अब  जमीन पर दिखने लगी है. टीएमसी के दूसरे  सबसे बड़े नेता अभिषेक बैनर्जी तक पर हमले की घटनाएं  हो चुकी है. सत्ता का संरक्षण हटते ही टीएमसी में भगदड़ की  नौबत है. तृणमूल  के तमाम सांसद, विधायक और जमीनी नेता लगातार कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के  संपर्क में बने हुए हैं. अभिषेक बनर्जी के पुराने कार्यबल और रवैये को लेकर पार्टी में जो असंतोष था, वह अब खुलकर सतह पर  आने लगा है. ममता यह भली - भांति जानती हैं कि केंद्रीय सत्ता के पूर्ण प्रभाव के सामने प्रादेशिक छत्रप के तौर पर अकेले टिक पाना नामुमकिन है.

    कैप्टन अमरिंदर सिंह के भी बदले  सुर 

     सियासी हलचल सिर्फ बंगाल तक ही सीमित नहीं है. पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की भी घर वापसी के आसार बेहद मजबूत हो गए हैं. कैप्टन बाट काफी समय से भाजपा के भीतर खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं. विशेष कर पंजाब भाजपा के मौजूदा अध्यक्ष ढिल्लन की कार्य प्रणाली को लेकर वह सार्वजनिक रूप से नाराजगी जाहिर कर चुके हैं, जबकि ढिल्लन को बीजेपी में लाने वाले खुद कैप्टन ही थे. कांग्रेस के अत्यंत वरिष्ठ सूत्र ने अनौपचारिक बातचीत में कहा  कि जिस दिन सोनिया गांधी ने कैप्टन को फोन घुमा दिया, उसी दिन उनकी वापसी तय है. हालांकि, कांग्रेस इस बार  बेहद सख्त रूख अपनाए हुए हैं.

    अल्पसंख्यक मतों का गणित और लेफ्ट का पेच 
    कांग्रेस के लिए भी इस समय ममता बनर्जी को  साथ लाना राजनीतिक मजबूरी और जरूरत, दोनों है. पश्चिम बंगाल में नई सत्ता के उभार  के बाद  कांग्रेस को डर है कि यदि उसने जमीन मजबूत नहीं की, तो अल्पसंख्यक वोट बैंक पूरी तरह वाम दलों या टीएमसी के बिखरे हुए धड़ों में बंट जाएगा. कांग्रेस को बंगाल में खुद को स्थापित करने के लिए मजबूत और स्थापित चेहरे की जरूरत है. कांग्रेस हाल ही में केरल में वामपंथियों को हराकर सत्ता में आई है. बंगाल में लिफ्ट को मजबूत होने देना कांग्रेस के लिए केरल की जमीन को खतरे में डालना होगा. इसीलिए, कांग्रेस के लिए बंगाल में वामपंथियों के मुकाबले टीएमसी का ढांचा अधिक मुफीद और व्यावहारिक बैठता है.

    जगन रेड्डी पर संशय बरकरार 

    इसी कड़ी में आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस जगनमोहन रेड्डी  को लेकर भी कांग्रेस के  एक धड़े में सुगबुगाहट तेज है. हालांकि, जगन की वापसी की राह इतनी आसान नहीं दिखती. जिस तरह से अतीत में कांग्रेस के तत्कालीन  शीर्ष नेतृत्व ने जगन रेड्डी और उनके परिवार के साथ जो बर्ताव किया, वह जगन भूल नहीं सकते. फिर भी राजनीति में कोई भी दरवाजा सदा के लिए बंद नहीं होता.