बंटवारा, उत्तराधिकार और लंबा कानूनी संघर्ष... सिर्फ संपत्ति तक सीमित नहीं सिंधिया राजघराने का विवाद
सिंधिया राजघराने का 40 हजार करोड रुपए का संपत्ति विवाद, जो पांच दशक पहले शुरू हुआ था, अब 8 जुलाई, बुधवार को प्रस्तावित समझौते से फिर से चर्चा में है. यह विवाद सिर्फ संपत्ति तक सीमित नहीं, बल्कि उत्तराधिकार, वसीयत और ट्रस्टों के नियंत्रण जैसे कानूनी प्रश्नों से जुड़ा हुआ है. समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की यह विशेष रिपोर्ट:-
ग्वालियर, 7 जुलाई 2026. सिंधिया राजघराने की करीब 40 हजार करोड रुपए की संपत्तियों को लेकर कल यानी 8 जुलाई, बुधवार को कोर्ट में प्रस्तावित समझौते ने एक बार फिर उस विवाद को चर्चा में ला दिया है, जिसकी शुरुआत करीब पांच दशक पहले हुई थी. यह विवाद केवल संपत्तियों के स्वामित्व तक सीमित नहीं रहा. समय के साथ इसमें उत्तराधिकार, वसीयत, ट्रस्टों के नियंत्रण और पारिवारिक अधिकारों, जैसे कई कानूनी प्रश्न जुड़ते गए. यही वजह है कि अलग-अलग दौर में देश के विभिन्न अदालतों में जुड़े अनेक मुकदमे पहुंचे.
1971 में तैयार हुई विवाद की पृष्ठभूमि
इस विवाद की पृष्ठभूमि वर्ष 1971 में तैयार हुई, जब सिंधिया परिवार में संपत्तियों के बंटवारे को लेकर एक मौखिक समझौता हुआ. बाद में मुंबई की अदालत के आदेश के जरिए इस व्यवस्था को कानूनी स्वरूप दिया गया. राजमाता विजयाराजे सिंधिया को मिली संपत्तियों का बड़ा हिस्सा उनके द्वारा स्थापित 15 चैरिटेबल ट्रस्टों को सौंप दिया गया.
राजमाता ने किए दीवानी के मुकदमे
पिछली सदी के अंतिम दशक में राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने पुणे की अदालत में दो अलग-अलग दीवानी मुकदमे दायर किए. इनमें एक अचल संपत्तियों, जैसे महलों, भवनों और जमीनों के स्वामित्व से जुड़ा था, जबकि दूसरा आभूषण, कैश और अन्य चल संपत्तियों पर अधिकार को लेकर था.
सामने आई वसीयत
वर्ष 2001 में राजमाता के निधन के बाद विवाद और गहरा गया. मुंबई अदालत में प्रस्तुत वसीयत में दावा किया गया कि उनके नियंत्रण वाली अधिकांश संपत्तियां उनकी बेटियों के नाम थी. इसी दौरान वसीयत की वैधता और उसकी व्याख्या को लेकर अलग-अलग पक्ष अदालत पहुंचे.
ट्रस्टियों में बदलाव का आरोप
राजमाता के निधन के बाद सर जीवाजी राव ट्रस्ट और कृष्ण माधव ट्रस्ट के संचालक को लेकर भी विवाद सामने आया. आरोप लगाया गया कि राजमाता के निधन के बाद ट्रस्टियों में बदलाव किया गया, जिसे अदालत में चुनौती दी गई. बाद के वर्षों में अलग-अलग संपत्तियों और संस्थाओं के स्वामित्व एवं नियंत्रण को लेकर देश की विभिन्न अदालतों में 50 से अधिक मुकदमे दायर हुए. वर्ष 2006 में विदिशा स्थित सम्राट अशोक टेक्नोलॉजी इंस्टिट्यूट का संचालन करने वाली समिति को लेकर भी विवाद न्यायालय तक पहुंचा.
इस तरह हुआ उत्तराधिकार का दावा
विवाद ने नया मोड़ वर्ष 1989 में लिया, जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने संपत्तियों के बंटवारे को अदालत में चुनौती देने के साथ स्वयं को उत्तराधिकारी घोषित किए जाने का दावा भी प्रस्तुत किया. इसके बाद मामला केवल हिस्सेदारी का नहीं रहा, बल्कि उत्तराधिकार और संपत्तियों के नियंत्रण का व्यापक कानूनी विवाद बन गया.
सिंधिया राजघराने का 40 हजार करोड़ का संपत्ति विवाद
अब समाधान की ओर, 8 जुलाई को कोर्ट में लगेगी समझौते पर मुहर
सिंधिया राजघराने की करीब 40 हजार करोड़ रुपए से अधिक की संपत्ति को लेकर लगभग चार दशक से चला रहा पारिवारिक विवाद अब समाधान की ओर बढ़ गया है. केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनकी तीनों बुआ --- वसुंधरा राजे, यशोधरा राजे और उषा राजे के बीच संपत्ति बंटवारे को लेकर हुई आपसी समझौते की औपचारिक प्रक्रिया 8 जुलाई यानी कल
बुधवार को न्यायालय में पुरी की जाएगी. इसके लिए दोनों पक्ष वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए न्यायालय में अपनी मौजूदगी दर्ज कराएंगे. बता दें कि वसुंधरा राजे राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री रही है. जबकि यशोधरा राजे मध्य प्रदेश में मंत्री रह चुकी हैं.
देशभर में है राजघराने की संपत्ति
सिंधिया राजघराने की बेशुमार संपत्ति देश के कई शहरों में है. इनकी कीमत का आकलन करीब 40 हजार करोड़ रुपए से अधिक किया जा रहा है. इनमें ग्वालियर में लगभग 12.40 लाख वर्ग फीट क्षेत्रफल वाला जयविलास पैलेस प्रमुख हैं. इसकी अनुमानित कीमत करीब 10 हजार करोड़ बताई जाती है. इसके अलावा 100 से अधिक कंपनियों के शेयर, शिवपुरी में माधव विलास पैलेस व हैप्पी विलास और जॉर्ज कैसल कोठी, उज्जैन का कालियादेह पैलेस, दिल्ली का ग्वालियर हाउस, राजपुर रोड का प्लॉट और सिंधिया बिल्ला, पुणे का पद्म विलास पैलेस, वाराणसी का सिंधिया घाट और गोवा स्थित विठोबा मंदिर सहित अन्य संपत्तियां भी इस विवाद का हिस्सा है.