• एमपी सरकार के  खजाने से 600 करोड़ गायब : सरकारी पैसा पत्नी- रिश्तेदारों के अकाउंट में भेजा, 400 पर प्राथमिकी दर्ज

    मध्य प्रदेश सरकार जहां खर्च घटाने के लिए मंत्रियों - अफसरों की विदेश यात्राओं और सरकारी कार्यक्रमों में महंगे होटलों के इस्तेमाल पर रोक लगा रही है, वहीं राज्य के बजट का भुगतान करने वाले सरकारी वित्तीय सिस्टम में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी सामने आई है. समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की सनसनीखेज रिपोर्ट :-

    भोपाल, 25 अगस्त 2026. मध्य प्रदेश के सरकारी खजाने में  सरकारी कर्मचारी और अधिकारियों ने कथित तौर पर 600 करोड़ रुपए की हेराफेरी की है. अब तक 59 प्राथमिकी दर्ज है. सरकारी खजाने में सरकारी कर्मचारी और अधिकारियों ने ही करोड़ों रुपए की हेराफेरी कर दी है. यह हेराफेरी 10 या 20 करोड़ की नहीं, बल्कि 600 करोड़ की हुई है. इसका खुलासा कोष एवं लेखा संचालनालय की स्टेट फाइनेंशियल इंटेलिजेंस सेल की  तहकीकात में हुआ है.

    जांच में सामने आया कि अलग-अलग विभाग के कर्मचारी, अधिकारियों ने सिस्टम की कमियों का लाभ उठाकर सरकारी खातों के जगह पर अपने निजी या करीबियों के खाते में जोड़ दिए और जो पैसा सरकारी खातों में जाना चाहिए था, वह रकम धीरे-धीरे इनके खातों में पहुंचता रहा. गड़बड़ी का खुलासा होने के बाद प्रदेश भर में अब तक 59 प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी है, इसमें 400 से अधिक कर्मचारी और अधिकारियों को आरोपी बनाया गया है.

    कर्मचारी- अधिकारियों ने की 600 करोड़ की हेराफेरी

    प्रदेश सरकार के बजट के पूरे पैसों का भुगतान इंटीग्रेटेड फाइनेंशियल मैनेजमेंट इनफॉरमेशन सिस्टम के जरिए होता है. पूरे प्रदेश में इस सिस्टम के जरिए पैसों का लेनदेन होता है. प्रदेश में वित्तीय व्यवस्थाओं से जुड़े अधिकारी - कर्मचारियों ने इस सिस्टम की कमजोरी का लाभ उठाया.

    वहीं, जब कोष एवं लेखा संचालनालय की स्टेट फाइनेंशियल इंटेलिजेंस सेल की पकड़ में एक के बाद एक मामले सामने आए तो अधिकारी भी चौंक गए. क्योंकि यह चोरी 600 करोड़ से अधिक की निकली. अधिकारी- कर्मचारियों ने अलग-अलग तरीकों से सरकारी सिस्टम में सेंध लगाया और जो पैसा सरकारी खजाने में पहुंचना चाहिए था, उसका रास्ता अपने अकाउंट में मोड़ दिया.

    इस तरह की गई खजाने से चोरी

    उज्जैन के भैरवगढ़ जेल के प्रहरी रिपुदमन की सैलरी महज 35 हजार रुपए महीना थी, लेकिन उसकी सैलरी धीरे-धीरे बढ़कर 4 लाख 82 हजार रुपए तक पहुंच गई. दरअसल, इंटीग्रेटेड फाइनेंशियल मैनेजमेंट इनफार्मेशन सिस्टम में ट्रेजरी ऑफिसर के कई अधिकार सीधे कार्यालय प्रमुख को दिए गए. इसमें बिल वेरीफाई करने का अधिकार कार्यालय अधीक्षक को दिया गया. आरोप है कि वह कर्मचारियों के पीएफ की एप्लीकेशन को मंजूर करता और फिर  रिइंबर्स भी खुद ही कर देता था. इसके लिए वह कर्मचारी के मोबाइल नंबर के जगह पर खुद का नंबर डाल देता था, इसके कर्मचारियों को पता ही नहीं चलता था कि उसके अकाउंट से पीएफ की राशि निकल गई है.

    हालांकि, जेल प्रहरी होने के बाद भी वह जेल अधीक्षक के सभी काम करता था और इस वजह से जेल अधीक्षक के डिजिटल सिग्नेचर भी उसके पास ही रहते थे. दूसरा ऐसा ही मामला अलीराजपुर के कट्ठीवडा का सामने आया. इसमें ब्लॉक एजुकेशन ऑफिसर के पद पर काम करने वाले कमल राठौर पर आरोप लगे कि उसने ट्रेजरी में आने वाली रकम को अलग-अलग खातों में ट्रांसफर करना शुरू कर दिए. धीरे-धीरे यह राशि बढ़ाकर  20 करोड़  47 लाख  तक पहुंच गई. इस मामले में ईडी ने कार्रवाई की है. जांच में सामने आया है कि इस तरह की गड़बड़ी किसी एक विभाग में नहीं, बल्कि 15 से अधिक विभागों में हुई है. सबसे अधिक मामले स्कूली शिक्षा विभाग में सामने आए हैं. विभाग में ऐसे गड़बड़ी के 45 मामले सामने आ चुके हैं.

    जांच में पता चला है कि तकरीबन 305 करोड़ रुपए तो सीधे निजी खातों में ट्रांसफर हुआ है. इसमें अब तक 220 करोड़ रुपए की रिकवरी हो चुकी है और पूरे मामलों में करीब 59 प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी है. इसमें 400 से अधिक लोगों को आरोपी बनाया गया है. इन मामलों में  करीब 380 करोड़ रुपए की रिकवरी होना बाकी है. उधर, ईओडब्ल्यू उज्जैन के एसपी समर वर्मा ने बताया कि " ऐसे ही कुछ मामलों की जांच विभाग द्वारा की जा रही है. मामले की जांच में पता चला है कि रकम कई बैंक अकाउंट में ट्रांसफर हुई है, ऐसे में सभी खातों से जुड़े व्यक्तियों की भूमिका भी खंगाली जा रही है."