• आजादी के 79 साल बाद भी 2 किमी दूर पहाड़ के नीचे झिरिया से पानी ढोकर लाते हैं तब प्यास बुझती है झूरगीदादर के बैगा आदिवासियों की

    ग्रामीणों का कहना है कि उनके पूर्वज भी इसी झिरिया के पानी से अपनी प्यास बुझाते थे और आज उनकी पीढ़ी भी इसी पानी के भरोसे जिंदगी गुजार रही है। लेकिन इस पानी के साथ एक और बड़ा खतरा जुड़ा हुआ है। जिस झिरिया से इंसान पानी भरते हैं, उसी जगह जंगल के जंगली जानवर भी पानी पीने पहुंचते हैं। पढ़िए, कवर्धा से एके निर्मलकर की जमीनी हकीकत को बयां करती रिपोर्ट:-

    कवर्धा, 3 सितंबर 2026। कवर्धा जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो आजादी के दशकों बाद भी गांवों में बुनियादी सुविधाओं की जमीनी हकीकत बयां करती है। कवर्धा जिला मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर दूर बोड़ला विकासखंड के ग्राम पंचायत आमानारा के आश्रित गांव झूरगीदादर में रहने वाले बैगा आदिवासी आज भी पीने के पानी के लिए जंगल और खतरनाक घाट में उतरने को मजबूर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों पहले उनके पूर्वजों ने घाट के नीचे एक छोटी सी झिरिया बनाई थी। आज भी यही झिरिया पूरे गांव के लिए पीने के पानी का एकमात्र सहारा बनी हुई है।

    महिलाएं सिर पर गगरी और पुरुष कांवड़ के सहारे करीब दो किलोमीटर का मुश्किल सफर तय कर पानी घर तक पहुंचाते हैं। हैरानी की बात यह है कि जल जीवन मिशन जैसी सरकारी योजनाओं के बावजूद झूरगीदादर गांव में अब तक न तो पानी की टंकी बनी है, न पाइपलाइन बिछी है और न ही ग्रामीणों के लिए हैंडपंप या कुएं की व्यवस्था की गई है।

    बीहड़ जंगल... उबड़-खाबड़ रास्ता... और उसके बीच नीचे घाट में बहता एक छोटा सा जलस्रोत। यही जलस्रोत झूरगीदादर गांव के ग्रामीणों की जिंदगी का सहारा बना हुआ है। पीने के पानी के लिए गांव की महिलाएं सिर पर गगरी उठाती हैं, तो पुरुष कांवड़ के सहारे पानी ढोकर घर पहुंचाते हैं। करीब दो किलोमीटर के इस मुश्किल सफर के बाद कहीं जाकर परिवार की प्यास बुझती है।

    ग्रामीणों का कहना है कि उनके पूर्वज भी इसी झिरिया के पानी से अपनी प्यास बुझाते थे और आज उनकी पीढ़ी भी इसी पानी के भरोसे जिंदगी गुजार रही है।लेकिन इस पानी के साथ एक और बड़ा खतरा जुड़ा हुआ है। जिस झिरिया से इंसान पानी भरते हैं, उसी जगह जंगल के जंगली जानवर भी पानी पीने पहुंचते हैं।ग्रामीणों को घाट में उतरने से पहले ऊपर से यह देखना पड़ता है कि कहीं कोई जंगली जानवर पानी पीने तो नहीं आया। अगर जंगली जानवर नजर आ जाए तो ग्रामीणों को पानी लिए बिना ही वापस लौटना पड़ता है।

    बारिश के मौसम में ग्रामीणों की परेशानी और बढ़ जाती है। नाले में बनी झिरिया का पानी बारिश के दौरान गंदा और दूषित हो जाता है। मगर मजबूरी ऐसी है कि इसी पानी को छानकर ग्रामीण पीने और घरेलू उपयोग में लाते हैं। दूषित पानी के इस्तेमाल से बीमारियों का खतरा बना रहता है, लेकिन ग्रामीणों के पास इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है।

    सरकार की ओर से ग्रामीण इलाकों में हर घर तक नल से पानी पहुंचाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन झूरगीदादर की तस्वीर इन दावों पर सवाल खड़े करती है। ग्रामीणों का कहना है कि मूलभूत सुविधाओं को लेकर उन्होंने कई बार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से गुहार लगाई। आवेदन दिए... शिकायतें कीं... समाधान का इंतजार किया...लेकिन वर्षों बाद भी हालात जस के तस बने हुए हैं।


    झरिया के पानी पीने से कब मिलेगी मुक्ति?

    अब सवाल यह है कि आखिर झूरगीदादर के ग्रामीणों को झिरिया के दूषित पानी से कब निजात मिलेगी? कब गांव तक शुद्ध पेयजल की सुविधा पहुंचेगी? और कब ग्रामीणों को जंगल के खतरनाक रास्ते से पानी ढोने की मजबूरी से मुक्ति मिलेगी? अब देखना होगा कि खबर सामने आने के बाद संबंधित विभाग और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि झूरगीदादर गांव की सुध लेते हैं या फिर ग्रामीणों का यह संघर्ष यूं ही जारी रहता है।