पुरातन भारतीय जीवन-संस्कृति में अपनी कहानी तलाशता हिंदी सिनेमा
हिंदी सिनेमा अब अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है, जहां सनातन जीवन-संस्कृति और लोककथाओं में कहानियाँ तलाशी जा रही हैं। 'हनुमान अंश' जैसी फिल्मों की सफलता दर्शाती है कि दर्शक बड़े बजट से अधिक सांस्कृतिक स्मृति और भावुक जुड़ाव को महत्व देते हैं।
मुंबई, 23 सितंबर 2026। कहानी शायद वहीं लौट रही है, जहां से भारतीय सिनेमा ने अपनी यात्रा शुरू की थी।
वर्ष 1913 में दादा साहेब फाल्के ने जब राजा हरिश्चंद्र बनाई थी, तब भारतीय सिनेमा के पास न हजारों करोड़ का बजट था, न वीएफएक्स की चकाचौंध और न सितारों का बाजार। उसके पास एक कहानी थी, जिसे यह देश पहले से जानता था। एक चरित्र था, जिसे लोक अपने भीतर जीता था। सत्य था, त्याग था और अपनी सभ्यता से निकला हुआ एक नैतिक द्वंद्व था।
एक सदी से अधिक समय बाद पर्दा बदल चुका है, तकनीक बदल चुकी है, दर्शक बदल चुके हैं लेकिन शायद भारतीय मन की वह मूल धड़कन उतनी नहीं बदली।
2026 की छोटी-सी फिल्म हनुमान अंश ने इसी धड़कन को फिर सुनाई देने लायक बना दिया है।
नीम करौरी बाबा के जीवन और हनुमान भक्ति से प्रेरित हनुमान अंश लगभग ₹1.8 करोड़ के बजट में बनी। शुरुआत इतनी छोटी थी कि पहले दिन की कमाई करीब ₹10 लाख बताई गई। न कोई स्थापित सुपरस्टार, न हजारों स्क्रीन की शुरुआती ताकत। लेकिन दर्शकों की चर्चा ने फिल्म को उठाया और 45वें दिन तक उसका वैश्विक कारोबार लगभग ₹350 करोड़ के आसपास पहुंचने की खबरें आईं।
इस आंकड़े को केवल बॉक्स ऑफिस की सनसनी मान लेना शायद इस कहानी का सबसे छोटा अर्थ होगा।
बड़ा अर्थ कहीं और है।
आखिर ऐसा क्या था कि करोड़ों के प्रचार और बड़े सितारों के बिना एक साधारण सी दिखने वाली आध्यात्मिक कथा ने दर्शक को सिनेमाघर तक खींच लिया?
उत्तर शायद सिनेमा की तकनीक में कम और भारतीय समाज की सांस्कृतिक स्मृति में अधिक छिपा है।
भक्ति को देखा भर नहीं जाता, उसे अनुभव किया जाता है। आस्था किसी ग्राफिक्स इंजन में पैदा नहीं होती। संस्कृति कोई सेट नहीं है, जिसे करोड़ों रुपए खर्च कर खड़ा कर दिया जाए। दर्शन कोई संवाद भी नहीं, जिसे किसी बड़े अभिनेता से बुलवा देने भर से वह दर्शक के भीतर उतर जाए।
तकनीक आंख को चमत्कृत कर सकती है, भाव ही हृदय को छूता है और आस्था की कथा में यह अंतर बहुत बड़ा हो जाता है।
यही कारण है कि भारतीय धार्मिक-सांस्कृतिक आख्यानों को पर्दे पर उतारना किसी सामान्य फैंटेसी कथा को फिल्माने जैसा नहीं है।
राम को दिखाना और रामत्व को अनुभूत करा देना दो अलग क्षमताएं हैं। हनुमान जी का विराट स्वरूप रच देना और उनकी भक्ति का समर्पण दर्शक तक पहुंचा देना दो अलग उपलब्धियां हैं।
दर्शक यहां केवल कहानी देखने नहीं आता। वह अपने साथ अपनी दादी की सुनाई कथा, घर की आरती, गांव की रामलीला, मंदिर की घंटी, मानस की चौपाई और पीढ़ियों की स्मृति भी लेकर आता है।
इसलिए वह पर्दे पर केवल पात्र नहीं देख रहा होता, वह अपनी स्मृति से पर्दे का मिलान भी कर रहा होता है।
शायद रामानंद सागर की रामायण की स्थायी लोकप्रियता का एक सूत्र यहां भी खोजा जा सकता है। सीमित तकनीक के बावजूद उस प्रस्तुति ने कई पीढ़ियों के दर्शकों के मन में स्थान बनाया। तकनीकी दृष्टि से आज उससे कहीं अधिक विराट दृश्य बनाए जा सकते हैं, लेकिन सांस्कृतिक आख्यानों में तकनीकी श्रेष्ठता और भावात्मक स्वीकार्यता हमेशा एक ही चीज नहीं होती।