सुप्रीम कोर्ट में बड़ा खुलासा: 28 में से 14 मुख्यमंत्री गंभीर मामलों में घिरे, 89 केस के साथ कौन नंबर वन?
सियासत के शीर्ष पदों तक पहुंच चुके नेताओं के खिलाफ गंभीर मुकदमों का यह आंकड़ा लोकतंत्र में जवाबदेही की बहस को फिर तेज कर रहा है. रिपोर्ट में विधानसभा से लेकर लोकसभा तक आपराधिक मामलों की लंबी कतार सामने आई है और सबसे बड़ा सवाल है कि इन मामलों का फैसला आखिर कब होगा? समाचार संपादक देहाती विश्वनाथ की यह विशेष रिपोर्ट:-
नई दिल्ली, 19 अगस्त 2026. देश की राजनीति में आपराधिक मामलों का मुद्दा एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के सामने बेहद गंभीर रूप से उभरा है. सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित मुकदमों की तेजी से सुनवाई से जुड़े मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता और एमिकस क्यूरी विजय हंसारिया ने अदालत को बताया कि 28 राज्यों के 14 मौजूदा मुख्यमंत्री के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं. सूची में तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए.रेवंत रेड्डी 89 मामलों के साथ सबसे ऊपर बताए गए हैं. यह आंकड़ा केवल नेताओं के खिलाफ मामलों की संख्या नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की रफ्तार पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है.
रेवंत रेड्डी सबसे आगे, कई राज्यों के मौजूदा सीएम भी घेरे में
सुप्रीम कोर्ट में पेश रिपोर्ट के मुताबिक, गंभीर आपराधिक मामलों का सामना कर रहे मुख्यमंत्रियों की सूची में तेलंगाना के ए. रेवंत रेड्डी सबसे आगे हैं. उनके खिलाफ 89 मामले बताएं गए हैं. इसके बाद पश्चिम बंगाल के मौजूदा मुख्यमंत्री शुवेंदु अधिकारी के खिलाफ 29, कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार के खिलाफ 19 और आंध्र प्रदेश के एन. चंद्रबाबू नायडू के खिलाफ भी 19 मामले बताए गए हैं. जबकि रिपोर्ट में केरल के मौजूदा मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन के खिलाफ 18 मामले, झारखंड के हेमंत सोरेन के खिलाफ 5, महाराष्ट्र के देवेंद्र फडणवीस और हिमाचल प्रदेश के सुखविंदर सिंह सुक्कू के खिलाफ 4 -4 मामले दर्ज होने की जानकारी दी गई है. वहीं तमिलनाडु के मौजूदा मुख्यमंत्री सी. जोसफ विजय के खिलाफ 2 और बिहार के सम्राट चौधरी के खिलाफ भी 2 मामले बताए गए हैं.
इसके अलावा सिक्किम के पीएस तमांग, पंजाब के भगवंत मान, ओड़िशा के मोहन चारण माझी और राजस्थान के भजन लाल शर्मा के खिलाफ 1 -1 मामला दर्ज है. यहां एक अहम बात समझना जरूरी है, किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला लंबित होना दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है. अंतिम फैसला अदालत करती है. गंभीर मामलों की श्रेणी में आमतौर पर ऐसे अपराध आते हैं जिनमें 5 वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान हो सकता है. पिछले लोकसभा चुनाव संबंधी रिपोर्टों में भी इसी तरह की कसौटी का इस्तेमाल किया गया था.
विधानसभा में भी तस्वीर चिंताजनक
हंसारिया की रिपोर्ट में सिर्फ मुख्यमंत्रियों का आंकड़ा ही चिंता बढाने वाला नहीं है. राज्यों की विधानसभाओं में भी बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों ने गंभीर आपराधिक मामलों की घोषणा की है. रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में 292 में से 170 विधायक, यानी करीब 58%, गंभीर आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं. इसके बाद केरल में करीब 57 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश में 56%, और तेलंगाना में 49% विधायकों के खिलाफ गंभीर मामले बताए गए हैं.
जबकि झारखंड और ओड़िशा में यह अनुपात करीब 45--45 प्रतिशत, बिहार में 42 प्रतिशत और महाराष्ट्र में करीब 40% बताया गया है. पश्चिम बंगाल के 2026 विधानसभा चुनाव के बाद एडीआर के विश्लेषण में भी लगभग यही तस्वीर सामने आई थी. 294 विजयी उम्मीदवारों में से 190 ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए थे और 170 में से गंभीर आपराधिक मामलों की संख्या 113थी.
संसद में भी कम नहीं है दागदार रिकॉर्ड
लोकसभा के आंकड़े भी राजनीतिक व्यवस्था के लिए बड़ा सवाल खड़ा करते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, 543 सदस्यीय लोकसभा में 170 सांसदों यानी करीब 31% सदस्यों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं.
कुछ राज्यों में स्थिति और ज्यादा गंभीर नजर आती है.
तेलंगाना के 17 में से 11 सांसद, केरल के 21 में से 11 सांसद और बिहार के 40 में से 19 सांसद गंभीर आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं. जबकि उत्तर प्रदेश में 80 में से 34 सांसद, महाराष्ट्र में 48 में से 17, पश्चिम बंगाल में 42 में से 16 और आंध्र प्रदेश में 25 में से 9 सांसदों के खिलाफ ऐसे मामले बताए गए हैं.
वहीं, राज्यसभा में भी स्थिति लगभग अलग नहीं है. 233 सदस्यों में से 75 यानी 33% सदस्यों के खिलाफ अपराधिक मामले हैं . इनमें 40 सदस्य ऐसे हैं जिनके खिलाफ गंभीर श्रेणी के मामले बताए गए हैं.
4, 192 मुकदमे अदालतों में अटके
अब सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने नेताओं पर मामले दर्ज हैं. सवाल यह भी है कि इन मुकदमों का निपटारा कितनी तेजी से हो रहा है.